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________________ श्री सुधर्मगष्ठ परीक्षा. ( १ ) कपटी कहिया एह जिणंदे, दुष्टनुं नाम न लीजे ॥ ए यांकणी ॥ पीलां कपडां खंने धावली, काख देखाडी बोले ॥ तरुणी सुंदर देखी विशेषे, पुस्तक वांचका खोले || क० ॥ २ ॥ पेंडा देखी काढे पढधो, पडघा मान करावे || खाजां वहोरे खांत करीने, पूरीने वोलि शवे ॥ क० ॥ ३ ॥ ज्ञान मिर्षे उपदेश दइने, सूक्ष्क्ष्क्ष परि राखे || ए कपटीनुं नाम न लीजे, इम उत्सूत्र जे जखेि || क० ॥ ४ ॥ ताल कूटया सार्थे ह्रींडे, भात्रिका ले दश वार | यात्राने मिष एणी परें विचरे, डूर रह्या श्राचार | क० ॥ ५ ॥ पाशेर घीथी करे पार, वली खाये शेर || तोही ताला इणिपरें बोले, उपवासे यावे फेर || क० || ६ || बगवानी परें पगलां मांडे, खाडुं डोढुं जो ॥। महिला सार्थे बोले मीठं, साधुवेष वगोवे ॥ क० ॥ ३ ॥ श्राचारांगे वस्त्रनो जांख्यो, श्वेत मानो पेतें । तेतो मारग डूर्रे मूक्यो, कपडां रंगे देतें ॥ क० ॥ ८ ॥ बाजीगर जेम बाजी खेले, धीवरे मांडी जाल ॥ ते संवेगी सुधामत जाबो, ए सहु श्राल जंजाल ॥ क० ॥ एए ॥ उंचुं घर अगोचर होवे, मासकरूप तिहां कीजे ॥ सुख सातायें पडिले चाले, साधु जन्म फल लीजें ॥ क० ॥ १० ॥ रात जगावे महिला Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034619
Book TitleSudharm Gaccha Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramharshi Muni
PublisherRavji Desar
Publication Year1912
Total Pages94
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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