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________________ (५०) श्री सुधर्मगल परीक्षा विधिमार्गनी निंदा करे ले ते पोतानी दुष्टता ते बड़े प्रगट करे , अने उत्सूत्र प्ररुपणनो दोष पोताना माथा उपर वहोरी ले ले. मात्र दृष्टिरागथी ते जीव संसारमा बहु नमे , घणा दुःखो सहन करवा पझे जे अने बोधीबीज पामq घणुं तेने मुश्केल यश जाय डे; माटे नव जयजीता गुण धारण करी सुविहित श्राचार्य महाराज अने जिनागम तेनी आराधना (सेवना) करवी. केमके तेज दिव्यनेत्र डे थने ते न होय तो दुःसमकासमां उत्तममार्ग पामवो घणो दुःकर . - यतः-कत्थ अम्हारिसा पाणी । दृसमा दोस दूसिया ॥ हा अणाहा कहं हुंता । न । हुँतो जश जिणागमो ॥१॥ नावार्थ:-दुसम कालना दोषे करी दूषित थयेला अमारा जेवा प्राणी अनाथो क्या ! हा इति खेदे जो जिनागमन होततो शी वले थात! एवी उत्तम नावना भागमविधिमार्ग उपर करवी. बागम उपर बहुमान राखनारा बहीमिक प्रेमरागे करीने रक्त एवा जे जीवो तेश्रोनोज कल्याण थाय . एवडा मत कीधा जूजुश्रा, तेह्ने माथे गुरु कुण हुआ; Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034619
Book TitleSudharm Gaccha Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramharshi Muni
PublisherRavji Desar
Publication Year1912
Total Pages94
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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