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________________ श्री सुधर्मग, परीदा. (४१) मादिक धीरपुरुषो (गणधरो) ए नाखी, तेज मर्यादा साची मानवी अने तेज मर्यादा प्रयत्न करी आदरै करवायोग्य ( उपादेय), अने तेथीज स्व परतुं का व्याण थाय . संवत पंदर पंचाशीए, क्रियातणी मति प्राणी हिये; थया ऋषीसर किरीयावंत, वैरागी देखीता संत ॥१२३॥ ते मत साचो कदे आपणो, बीजाने उथापे घणो; घणा पाट देखामे जणी, परंपरा थापे आपणी ॥ १५ ॥ न कहे साधुपणानी विगत, पाट नामनी थापे युगत; पण जे जाण हुवे ते जीय, साधुपणाविणु पाट नहोया.२५ गुरु लोपी पापी सहु कहे, तो कां बांमी अलगा रहे; सहुनुं माथा शिरुं पोषाल, ते बांडी को पड्या जंजाला५६ जो कहे ते आचारे होणं, तो पाट नाम को थापो लीण; जो गुरु तो निंदो कांइ तास, सेवो तेहनो गुरुकुशवास।१२७ साधुतमा विण दाखे पाट, तेज म जाणो सूधी वाट; जो ते सुधा गुरु जाणीया, तो लोपी कां अलगा थया ।१२७ गुरु लोपंता पातिक बहु, श्म मुख लोक कहे जे सहु; श्मतो प्रत्यनीकपणुंथाय, तो केम जिनमतआराधाय।१२। सूत्र समाचारि जे रहे, तेने निगुरा निगुरा कहे; ते उपर सांजळो विचार, मनमाणो आमलो लगार ॥१३० Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034619
Book TitleSudharm Gaccha Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramharshi Muni
PublisherRavji Desar
Publication Year1912
Total Pages94
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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