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________________ श्री सुधर्मगह परोक्षा. (११) ष्टान संसार वधारनार . श्राझा नंजिने त्रण कान, जिनपूजा मंडे सुविशाल तेहर्नु पण फल पामे नहि, जुन साख विचारी सही॥३३ यतः-आणा खंडणकारी । जवि तिकालं महा विनूश्ए ॥ पूएश् वीयरायं । संबंपि निरचयं तस्स ॥१॥ लावार्थः-वली जे जीव जोके त्रण काले मोटी विजूतिवडे वीतरागदेव- पूजन करे ने उतां जिनेश्वरदेवनी आणानुं खंडन करे ले थने वक्ष मात्र उघदृष्टिये वाहवाह कहेवराववामांज थानंद माने , तेनुं सर्व अनुष्टान तुषखंडनवत् निरर्थक डे, एटले जेम फोतरां खांडनारने कमोदनोलान मलतो नथी, तेम तेने पण अनुष्टाननो लान मसतो नथी. . तप जप संजम शीलविनाण, तसुफसपामे जो हुवे थाण; आणविना पण ते न प्रमाण, याचारंगे एह वखाण॥३४ यतः-अणाणाए एगे सोवठाणा, आणाए एगे निरुवाणा, एयंते माहोन एवं कुसलस्त दसणं इत्यादि. जावार्थ:-केटलाएक जिनाशायी विपरीत प्रवृत्ति पां Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034619
Book TitleSudharm Gaccha Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramharshi Muni
PublisherRavji Desar
Publication Year1912
Total Pages94
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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