SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 16
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( ४ ) किंतु साथ ही अर्हत भगवान्के विशेष स्वरूप के विषय में तीनों सम्प्रदायका परस्पर मतभेद है । दिगम्बर सम्प्रदाय अर्हत भगवान्के भूख, प्यास, राग, द्वेष, जन्म, बुढापा, मरण, आश्चर्य, पीडा, रोग, खेद, ( थकावट ) शोक, अभिमान, मोह, भय, नींद, चिंता, पसीना - ये १८ दोष नहीं मानता है और न उनपर किसी प्रकार के उपसर्ग का होना मानता है । यानी - दिगम्बर सम्प्रदायका यह सिद्धांत है कि अर्हत भगवान में १८ दोषरूप बातें नहीं पाई जाती हैं और न उनपर कोई मनुष्य, देव, पशु किसी प्रकारका उपद्रव ही कर सकता है । श्वेतांबर तथा स्थानकवासी सम्प्रदायमें अहंत भगवानूपर यद्यपि सिद्धांतकी अपेक्षा उपसर्गका अभाव बतलाया है यानी इन दोनों संप्रदाय के सिद्धांत ग्रंथ भी " अईत भगवान् पर कोई उपद्रव नहीं हो सकता है " ऐसा कहते हैं किन्तु प्रथमानुयोगके कथा ग्रंथ इस नियमके विरुद्ध भी प्रगट करते हैं जिस को हम आगे बतलावेंगे । तथा १८ दोषोंका अभाव भी अर्हत भगवानके बतलाते हैं किन्तु वे उन दोषोंके नाम दिगम्बर सम्प्रदायसे भिन्न कहते हैं । प्रवचनसारोद्धार ( शा० भीमसिंह माणक द्वारा बंबई से वि. सं. १९३४ में प्रकाशित तीसरा भाग ) के १२० वें पृष्ठपर उनका नाम यों लिखा है अमाण कोह मय माण लोह माया रईय अरईय | निद्द सोय अलिय वयण चोरीया मच्छर भयाय ॥ ४५७ ॥ पाणिवह पेम कीला पसंग हासाइ जस्स इय दोसा | अहारसवि पणा, नमामि देवाहिदेवं तं ॥ ४५८ ॥ ईर्ष्या, भय, अर्थात् अज्ञान, क्रोध, मद, मान, लोभ, माया, [ कपट ] रति (राग) अरवि, (द्वेष ) नींद, शोक, असत्य वचन, चोरी, हिंसा, प्रेम, क्रीडा और हास्य ये अठारह दोष अर्हन्तके नहीं होते हैं 1 इस विषय में दिगम्बर सम्प्रदाय के मान्य १८ दोष इस कारण ठीक ठहरते हैं कि अन्त भगवान् के ज्ञानावरणकर्म नष्ट होकर जो अनंतज्ञान ( केवलज्ञान ) प्रगट हुआ है उसके निमित्तसे आश्चर्य ( अचंभा यानी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034616
Book TitleShwetambar Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitkumar Shastri
PublisherBansidhar Pandit
Publication Year1930
Total Pages288
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy