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________________ तीर्थकरोंका दर्शन. (२७) विध निमित्त विलासथीए, विलसी प्रभु एकांत, अवतरिओ अभ्यंतरे, निश्चल ध्येय महंत ॥ २॥ _अर्थ-हे भगवन् तेरा गुणोंकी स्तुति करने मात्रसें तो, रसना (जीव्हा ), और मूर्तिद्वारा तेरा दरसणसें दृष्टि । और नव अंगकी पूजा करनेके समयमें मूर्तिद्वारा तेरा स्पर्श करके काया । और तेरा अनेक गुण गर्भित स्तुतिओंका-श्रवण करनेसें, दो श्रवण ( कर्ण)। और मूर्तिद्वारा तेरेको नमस्कार करनेके अवसरमें-मस्तक । यह सर्व प्रकारके, हमारे अंगके अवयवो, शुभ निमित्तमें जुडके, हमारी शुभ परिणति होते हुयें, ऐसे विविध निमित्तोके योगसें, हमारा अभ्यंतरमें दाखल हुयेला प्रभुको, एकांत स्थलमें विलसेंगे, तबही निश्चयसें ध्येयरूपे भगवान होगा । इसमें तात्पर्य यह है कि-प्रथम प्रभुकी मूर्तिका शुभ निमत्तमें, हमारे अंगके-अवयवोको, व्यवहारसें जोडेगे, उनके पिछे हीतीर्थकर भगवान्का स्वरूप, निश्चयसें हमारी परिणतिमें दाखल होंगे ? परंतु तीर्थंकरोंकी-आकृतिरूप, बाह्य स्वरूपका शुभ निमित्तमें, हमारे अंगोके जोडे बिना, निश्चय । स्वरूपसें तीर्थंकरोंका स्वरूपको तीन कालमें भी न मिलावेंगे ।। २ ॥ ॥ भाव दृष्टिमां भावतां, व्यापक सविठामि, उदासीनता अवरस्युं, लीनो तुज नामि । दिठा विणु पणि देखिये, मृतां पिण जगवें, अपर विषयथी छोडवें, इंद्रिय बुद्धि त्यजवें । पराधीनता मिट गए ए, भेदबुद्धि गइ दूर, अध्यात्म प्रभु प्रणमिओ, चिदानंद भरपुर ॥ ३ ॥ ____ अर्थ--पूर्वके उद्गारका तात्पर्य दिखाने के वास्ते, यही महात्माअपना अभिमाय प्रगटपणे जाहिर करते है । सो यह है कि-भाव Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034587
Book TitlePratima Mandan Stavan Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarvijay
PublisherChunilal Chagandas Shah
Publication Year
Total Pages42
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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