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Ācārya Kundakunda's Pravacanasāra:
जिणसत्थादो अढे पच्चक्खादीहिं बुज्झदो णियमा । खीयदि मोहोवचयो तम्हा सत्थं समधिदव्वं ॥
(1-86)
सामान्यार्थ - प्रत्यक्ष तथा परोक्ष प्रमाण-ज्ञान के द्वारा वीतराग सर्वज्ञ प्रणीत आगम से पदार्थों को जानने वाले पुरुष के नियम से मोह का समूह अर्थात् विपरीतज्ञान व विपरीतश्रद्धान नाश को प्राप्त होता है इसलिये जिनागम का अच्छी तरह (सम्यक्) अध्ययन (अभ्यास) करना चाहिये।
The man who acquires, through the study of the Scripture expounded by the Omniscient Lord, valid knowledge (pramāņa) - direct (pratyakşa) and other - of the reality of substances destroys, as a rule, the heap of delusion (moha). It is instructed, therefore, to study the Scripture meticulously.