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________________ शुभोपयोग निर्जरा का कारण नहीं 133 २५ शुभोपयोग निर्जरा का कारण नहीं पंचाध्यायी उत्तरार्ध के श्लोक : श्लोक ७६२ : अन्वयार्थ : 'बुद्धि की मन्दता से ऐसी भी आशंका नहीं करना कि शुभोपयोग, एकदेश से भी निर्जरा का कारण होता है क्योंकि शुभ उपयोग, अशुभ को लानेवाला होने से (मतलब जो शुभ उपयोग में धर्म समझते हैं और शुभ उपयोग से निर्जरा भी मानते हैं ऐसा एक वर्ग है, उन्हें यहाँ समझाया है कि स्वात्मानुभूति रूप निश्चय सम्यग्दर्शन के बिना शुभ उपयोग नियम से आत्मा में अल्प शुभ के साथ-साथ मोहनीयादि घाति कर्मों का आस्रव भी कराता है और वह मोहनीयादि घाति कर्म नियम से जीव को दुःख के करनेवाले हैं, अशुभ को लानेवाले हैं यानि शुभ उपयोग जीव को संसार से मुक्त नहीं कराता ऐसा समझाना है। परन्तु यहाँ शुभ उपयोग का निषेध नहीं समझना, नहीं तो लोग स्वच्छन्दता से अशुभ ही आचरण करेंगे; यहाँ उद्देश्य शुभ छुड़ाकर अशुभ में ले जाने का नहीं परन्तु निर्जरा मात्र शुद्ध उपयोग से ही होती है ऐसा बतलाना है और इसीलिये बतलाया है कि शुभ उपयोग) वह निर्जरा का हेतु नहीं हो सकता तथा न तो वह शुभ भी कहा जा सकता है।' इसलिये शुभ उपयोग से निर्जरा नहीं समझना और इस गाथा से शुभ का निषेध भी नहीं समझना। शुभ उपयोग वह शुद्ध उपयोग का (निर्जरा का) कारण नहीं परन्तु वह शुभ उपयोग शुभ भावों का (वीतराग देव-गुरु-शास्त्र के संयोग का) कारण अवश्य है, इसलिये एक मात्र आत्मा के लक्ष्य से यानि आत्मा की प्राप्ति के लिये ( सम्यग्दर्शन के लिये) जो योग्यता रूप शुभ उपयोग है, वह अपेक्षा से आचरण करने योग्य है, क्योंकि जीव को अशुभ उपयोग में रहने का उपदेश तो कोई भी शास्त्र नहीं देते और इसीलिये पुण्य (शुभ) को हेय समझकर स्वच्छन्दता से कोई अशुभ उपयोग रूप परिणमता हो तो वह अपने अनन्त संसार को बढ़ाने का ही उपाय कर रहा है ऐसा समझना । यहाँ शुभ उपयोग को निर्जरा का कारण नहीं माना है, क्योंकि गुण श्रेणी निर्जरा का एकमात्र कारण शुद्धोपयोग ही है, इस अपेक्षा से शुभ उपयोग (पुण्य) हेय है परन्तु कोई स्वच्छन्दता से अन्यथा समझकर यदि पुण्य को हेय कहकर पाप रूप परिणमेगा तो ऐसा तो किसी भी आचार्य भगवन्तों का उपदेश नहीं है और ऐसी अपेक्षा भी नहीं है। रत्नकरण्डक श्रावकाचार श्लोक १४८
SR No.034446
Book TitleSamyag Darshan Ki Vidhi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayesh Mohanlal Sheth
PublisherShailendra Punamchand Shah
Publication Year
Total Pages241
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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