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________________ सम्यग्दर्शन के लिये योग्यता जैसे कि - क्रोध, मान, माया, लोभ, पाँच इन्द्रियों के विषय इत्यादि। जब तक मिथ्यात्व है तब तक जीव का ज़्यादातर समय निगोद में ही बीतेगा क्योंकि निगोद से निकलकर जीव उत्कृष्ट (ज़्यादा से ज़्यादा) २००० सागरोपम के लिये ही बाहर रहता है, बाद में अपने-आप निगोद में वापिस चला जाता है, जहाँ वह अनादि काल से रहता था और भविष्य में भी अनन्त काल तक रह सकता है, जहाँ (निगोद में) दुःख के अलावा कुछ नहीं होता। अर्थात् वह जीव असंख्यात पुद्गलपरावर्तन काल तक एकेन्द्रिय जीव राशि में रह सकता है, जहाँ दु:ख के अलावा कुछ नहीं होता। 115 संसार में लोभ से तृष्णाजनित दुःख जन्म लेता है और लाभ से वह तृष्णाजनित दुःख और लोभ बढ़ते जाते हैं। उस लाभ के लिये अनुकूल जीव के ऊपर राग होता है और प्रतिकूल जीव के ऊपर द्वेष होता है, साथ ही लाभ बढ़ाने के लिये माया का भी सहारा लिया जाता है। अधिक लाभ मिलने से मान पैदा होता है। इस तरह से जीव अनन्तानुबन्धी कषायों से बच नहीं पाता, जिस से संसार का चालक बल ऐसा मोह अधिक प्रगाढ़ बनाता है अर्थात् मिथ्यात्व अधिक प्रगाढ़ बनता है। इस तरह से जीव पूर्व के कर्मों के फल रूप संयोग में रति-अरति करता रहता है अर्थात् उदय भाव का प्रतिकार करके या उस भाव में रच-पचकर नया कर्म बाँधता है। इस संसार की विचित्रता ऐसी है कि मुझे जिस का मुँह भी देखना पसन्द नहीं होता, वही जीव अन्य भवों में मुझे पत्नी, पुत्र, परिवार आदि रूप से प्राप्त होता है, जिन्हें मुझे सारी ज़िन्दगी झेलना पड़ता है और इस तरह से मेरी ज़िन्दगी नरक जैसी हो जाती है, इसीलिये हमें इसी भव में ही सभी जीवों से मैत्री भाव कर लेना आवश्यक है। इसी प्रकार से जीव इन्द्रियों के सुख के पीछे भी पागल बनकर अनन्त दुःख सहन करता आ रहा है क्योंकि इन्द्रिय सुख, कभी समाप्त नहीं होनेवाली ऐसी इन्द्रियों की तृष्णा को जन्म देता है और इन्द्रियों के विषय की वह तृष्णा रूप पीड़ा जीव को कभी समाप्त नहीं होनेवाला तृष्णाजनित और शारीरिक दुःख देती है। अनादि से ऐसे विष-चक्र में फँसा हुआ जीव संसार में रुल रहा है ; इस विष-चक्र से बच पाना मुश्किल अवश्य है, परन्तु नामुमकिन नहीं। हर एक जीव ने अपने परिवार के हर सदस्य के साथ अनादि से सब प्रकार के रिश्ते अनेकों बार किये हैं। संसार का जन्म विकल्प रूप से पहले मन में होता है और बाद में उसे मूर्त रूप प्राप्त होता है, इसलिये संसार का अन्त चाहनेवालों को सबसे पहले मन से विकल्प रूप संसार का नाश करना चाहिये। इससे पीछे बताये अनुसार अपने आप को प्रश्न करना चाहिये कि हमें क्या पसन्द
SR No.034446
Book TitleSamyag Darshan Ki Vidhi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayesh Mohanlal Sheth
PublisherShailendra Punamchand Shah
Publication Year
Total Pages241
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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