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________________ म०प० ।। ३६ ।। 125040529-19 बाहिर प्रिंतरं नवहिं ॥ सरीरादि सजोधणं ॥ मासावर कापणं ॥ सर्व तिविदेश वोसिरे ॥ ४ ॥ बाह्य उपधी ("वखादिक ), अभ्यंतर उपधी ( क्रोधादिक ) शरीर विगेरै भोजन सहित मन, वचन ने काया एत्रण प्रकारे सर्व वोसिरा ॥ ४ ॥ राग बंध पनसं च ॥ हरिसं दीपजावियं ॥ नस्तुगतं जयं सोगं रई मयं च वोसिरे ॥ ५ ॥ रागनो बंध, द्वेष, हर्ष अने दीनपणुं, आकुलपणुं, भय, शोक, रति, मद, ए मचलाने मिराउँछु ॥५॥ रोसे परिनिवेसेा ॥ कय तहेव सझाए | जोमे किंचिवि जनि ॥ तिविदं तिविदेश खामेमि ॥ ६ ॥ रोपे करीने, कदाग्रहवडे, अकृतन्नतावडे तेमज अमत् व्यानने विषे जे हुं कांड अविनयपणे बोल्यो ते त्रिविधे त्रिविधे खमावुं ॥ ६ । खामि स जीवे ॥ सबे जीवा खमंतु मे ॥ आसवे वोसिरत्ताएं || समादिं पनि संघए || 9 || 25610007985101915-262524 पयनो. ॥ ३६ ॥
SR No.034177
Book TitleMurkhshatakam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Hansraj Shravak
PublisherHiralal Hansraj Shravak
Publication Year1926
Total Pages154
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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