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________________ we मम परिवद्यामि॥नम्ममत्तं नवन्नि प्रासंबणं च मे पाया ॥ अवसेसं च वोसिरे ॥२३॥ यमतारहितपंणामां तत्पर थयो तो ममतानो त्याग करुंछु वळी मने आत्मा भालंबन भूत के वीजा सर्व पदार्पने वोसिराचुंछु ॥ २३ ॥ आया हु मदं नाणे ॥ आया मे दसणे चरित्ने अ॥ पाया पच्चरकाणे ॥ पाया मे संजमे जोगे ॥ २५ ॥ निश्चे मने मानमा मात्मा, दर्शनमा अने चारित्रमा मने आत्मा, पचरूखाणमा मने आत्मा, संजमजोगमा मने आत्मा ( आनंबन ) थाओ ॥ २४ ॥ - एगो वच्च जीवो ॥ एगो चेवुववव ।। एगस्स चेव मरणं॥ एगो सिप नीर ॥२५॥ जीव एकलो जाय छे, नकी एकलो उपजेछे, एकलाने ज मरण पण थायछे, अने कर्मरहित थयो छतो। एकलोज सिद्ध थायछे ॥ २५ ॥ एगो मे सासन अप्पा ॥ नाण देसण संजुन॥ सेसा मे बाहिरा मावा ॥सव्वे संजोग लरकणा ॥ ६॥ - SH
SR No.034177
Book TitleMurkhshatakam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Hansraj Shravak
PublisherHiralal Hansraj Shravak
Publication Year1926
Total Pages154
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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