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श्रमण सक्त
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२१२ तहा नईओ पुण्णाओ, कायतिज्ज त्ति नो वए।
(द ७ ३८ क, ख) नदियाँ पूर्ण हैं, वे शरीर से पार करने योग्य हैं—मुनि इस प्रकार न बोले।
२१३
नावाहि तारिमाओ त्ति, पाणिज्ज त्ति नो वए।
(द ७ ३८ ग, घ) नदिया नौका के द्वारा पार करने योग्य हैं, तट पर बैठे हुए प्राणी उसका जल पी सकते हैं-मुनि इस प्रकार न बोले।
२१४
कीरमाण ति वा नच्चा, सावज्ज न लवे मुणी।
(द ७ ४० ग, घ) दूसरे के लिए किए जा रहे सावध व्यापार को जानकर मुनि सावध वचन न बोले।
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