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श्रमण सूक्त
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११२ सुर वा मेरग वा वि अन्न वा मज्जग रस ससक्ख न पिबे भिक्खू जस सारक्खमप्पणो।।
(द ५ (२) ३६) अपने सयम की रक्षा करता हुआ भिक्षु सुरा, मेरक या अन्य किसी प्रकार का मादक रस आत्म-साक्षी से न पीए।
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__ ११३ वड्डई सोडिया तस्स मायामोस च भिक्खुणो। अयसो य अनिव्वाण सयय च असाहुया।
(द ५ (२) ३८)
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उस भिक्षु के उन्मत्तता, माया-मृषा. अयश, अतृप्ति और सतत असाधुता-ये दोष बढते हैं।
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