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श्रमण सूक्त
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मुहु मुहु मोहगुणे जयत
अगरूवा समण चरत ।
फासा फुसंती असमजस च न तेसु भिक्खू मणसा पउस्से || (उत्त ४११ )
बार-बार मोहगुणो पर विजय पाने का यत्न करने वाले उग्र-विहारी श्रमण को अनेक प्रकार के प्रतिकूल स्पर्श पीडित करते हैं, असतुलन पैदा करते हैं। किन्तु वह उन पर मन से भी प्रद्वेष न करे ।
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