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श्रमण सूक्त
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( १६३
आयरिय कुविय नच्चा
पत्तिएण पसायए। विज्झवेज्ज पजलिउडो वएज्ज न पुणो त्ति य।।
(उत्त १ ४१)
आचार्य को कुपित हुआ जानकर विनीत शिष्य प्रतीतिकारक (या प्रीतिकारक) वचनो से प्रसन्न करे। हाथ जोडकर उन्हे शान्त करे और यो कहे कि मैं पुन ऐसा नहीं करूगा।
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