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________________ यह अंतर मन में स्पष्टतया बनाये रखना होता है अन्यथा तुम पतंजलि का गलत अर्थ लगा सकते हो। जो कुछ भी तुममें बाहर से आया है और जो गलत है, उसे मिटा देना होता है ताकि वह जो तुम्हारे भीतर है, बह सके, खिल सके। अभ्यास, सतत आंतरिक अभ्यास, आदतों के विरुद्ध होता है। दूसरी बात, दूसरी बुनियादी शिला, वैराग्य है - इच्छाशून्यता । यह भी तुम्हें गलत दिशा में ले जा सकता है। और ध्यान रहे, ये नियम नहीं हैं, ये सीधी-सादी दिशाएं हैं। जब मैं कहता हू कि ये नियम नहीं हैं, तो मेरा मतलब होता है किसी सम्मोह की तरह उनके पीछे नहीं चलना है। उन्हें समझना होता है- उनका अर्थ, उनका महत्व। और उस अर्थवत्ता को अपने जीवन में उतारना होता है। वह सार्थकता हर एक के लिए अलग होने वाली है, अतः ये जड़ नियम नहीं हैं। तुम्हें मतांध होकर उन पर नहीं चलना है तुम्हें महत्व को समझना है और फिर उसे स्वयं के भीतर विकसित होने देना है। यह खिलावट हर व्यक्ति में अलग-अलग ढंग से होने वाली है। इसलिए ये मुरदा मतांध नियम नहीं हैं; ये सीधी-सादी दिशाएं हैं। वे दिशा निर्देश देती हैं। वे तुम्हें ब्योरा नहीं देती। मुझे याद आता है कि एक बार मुल्ला नसरुद्दीन म्यूजियम के द्वारपाल की हैसियत से काम कर रहा था। जिस पहले दिन वह नियुक्त हुआ, उसने नियमों के बारे में पूछा कि कौन-से नियमों पर चलना है। उसे पुस्तक दी गयी उन नियमों वाली, जिन्हें द्वारपाल द्वारा पालन किया जाना था। उसने याद कर लिया उन्हें उसने पूरा ध्यान रखा एक भी ब्योरा न भूलने का तब पहले दिन जब वह काम पर था, पहला दर्शक आया। उसने दर्शक से कहा, अपना छाता वहां दरवाजे के बाहर छोड़ देने को । दर्शक चकरा गया। वह बोला, 'लेकिन मेरे पास कोई छाता नहीं है।' तो नसरुद्दीन बोला, 'उस अवस्था में तुम्हें वापस जाना होगा और छाता लाना होगा क्योंकि यही नियम है। जब तक कि दर्शक अपना छाता यहां बाहर न छोड़े, उसे अंदर नहीं आने दिया जा सकता।' और बहुत सारे लोग हैं जो नियमों से मस्त हैं। वे अंधों की भांति अनुगमन करते हैं। पतंजलि तुम्हें नियम देने में रुचि नहीं रखते। जो कुछ वे कहने वाले हैं वे स्वाभाविक दिशाएं हैं। उनका अनुगमन नहीं करना है, बल्कि उन्हें समझना है। अनुगमन तो उस समझ में चला आयेगा । और उल्टा घटित नहीं हो सकता है। अगर तुम नियमों के पीछे चलते हो, तो समझ नहीं आयेगी। लेकिन यदि तुम नियमों को समझते हो, तो अनुगमन अपने आप आ पहुंचेगा, छाया की तरह । इच्छाशून्यता एक दिशा है। यदि तुम नियम की भांति उसके पीछे चलते हो, तब तुम अपनी इच्छाओं को मारना शुरू कर दोगे। और बहुतों ने यह किया है, लाखों ने यही किया। अपनी इच्छाओं को मारना शुरू कर देते है। बेशक, ऐसा अपने आप से पीछे चला आता है। यह बुद्धिसंगत है। यदि
SR No.034095
Book TitlePatanjali Yoga Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages467
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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