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________________ 1222 नैषधमहाकाव्यम् / रत्नकान्तिरूपिणी नदी चरणरूप रक्तकमलसे युक्त हो रही है। नदी में रक्तकमलका होना उचित ही है / ऐसा मृदु वचन कहकर नलने पलङ्गपर बैठी हुई दमयन्तीके चरणोंको नतमस्तक होकर प्रणाम किया ] // 132 // तत्पदाखिलनखानुबिम्बनैः स्वैः समेत्य समतामियाय सः / 'रुद्रभीतिविजिगीषया रतिस्वामिनोपदशमूर्त्तिताभृता // 133 / / तदिति / सः नलः, स्वैः आत्मीयैः, तस्याः दमयन्त्याः, पदयोः चरणयोः, अखि. लेषु समग्रेषु, दशस्वेवेति यावत् / नखेषु अनुबिम्बनैः प्रतिबिम्बैः, समेत्य मिलित्वा, दशभिः मेलनेन एकादशसवयको भूत्वेत्यर्थः / रुद्रेभ्यः एकादशभ्यः रुद्रदेवताभ्यः, भीतेः भयस्य, विजिगीषया जेतुमिच्छया, भयात् परित्रातुमिच्छया इत्यर्थः / उप समीपे दशानाम् उपदशाः एकादश इत्यर्थः / 'सङ्ख्याव्यया-' इत्यादिना बहुव्रीहौ समासान्तो डच टिलोपश्च / मूर्तयः यस्य तस्य भावः तत्ता तां बिभर्तीति तादृशेन, रतिस्वामिना कामेन, समतां सादृश्यम् , इयाय प्राप / एकादशरुद्रजिगीषया एका. दशमूर्तिधारी साक्षात काम इव अलच्यत इत्युत्प्रेक्षा // 133 // ( प्रणाम करते हुए ) उस ( नल ) ने उस ( दमयन्ती ) के दोनों चरणोंके सब (दशों) नखोंमें अपने प्रतिबिम्बोंसे युक्त होकर रुद्र (महाक्रोधी शिवजी ) के भय ( पाठाबाहुल्यता अर्थात् एकादश संख्या ) को जीतनेको इच्छासे ग्यारह मूर्ति धारण किये हुए कामदेवकी समानताको प्राप्त किया। [ जब नल दमयन्तीको प्रसन्न करनेके लिए उसके चरणोंपर गिरे, तब उसके चरणोंके दशो नखोंमें नलका प्रतिबिम्ब पड़ गया, वह ऐसा मालूम पड़ता था कि ग्यारह रुद्रोंको अकेला जीतना अशक्य मानकर उनसे डरे हुए कामदेवने भी ग्यारह ( 10 प्रतिबिम्ब तथा 1 स्वयं कुल 11 ) रूप धारण कर लिया हो / इससे नलका माक्षात्कामदेवतुल्य होना तथा दययन्तीके चरणनखोंका रत्नवत् निर्मल होना सूचित होता है ] // 133 / / आख्यतैष कुरु कोपलोपनं पश्य नश्यति कृशा मधोर्निशा / एवमेव तु निशानरे वरं रोषशेषमनुरोत्स्यसि क्षणम् / / 134 / / आख्यतैष इति / हे प्रिये ! कोपस्य क्रोधस्य, लोपनं संहरणम् , कुरु विधेहि, क्रोधं परित्यज इत्यर्थः / यतः कृशा क्षीणा, अल्पपरिमाणा इत्यर्थः / मधोः वस. न्तस्य, निशा रात्रिः, नश्यति अपगच्छति / पश्य अवलोकय निशान्तरे तु अन्यस्यां रात्रौ पुनः, एवमेव इत्थमेव, क्षणं क्षणमात्रम् , न तु चिरमिति भावः / रोषशेषम् अविशिष्टक्रोधम् अनुरोत्स्यसि अनुसरिष्यसि, वरं तत्त किञ्चित् प्रियम् , एषः नलः, आख्यत इति आह स्म / चतिको लुङि ख्याजादेशे तङ्, 'भस्यतिवक्तिख्यातिभ्यो. ऽङ' इति च्लेरडादेशः // 134 // 1. 'रुद्रभ्रम-' इति पाठान्तरम् /
SR No.032782
Book TitleNaishadh Mahakavyam Uttararddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1997
Total Pages922
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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