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________________ पंन्यासजीश्री, गणिश्री, क्या लिखू ? आप का पत्र मिला । वेदना-संवेदना ज्ञात हुई । हाथ कांप रहे हैं । हृदय गद्गद् है । आंखें भीगी-भीगी है । श्वास-श्वास में याद । क्षण-क्षण पल-पल याद । कोई भी वस्तु हाथ में लूं और याद । कोई भी क्रिया करूं और याद । मंदिर में जाउं, 'प्रीतलड़ी' (स्तवन) बोलूं और हृदय भर जाता है, कंठ अवरुद्ध हो जाता है । वात्सल्य भरा हृदय ! करुणा बरसते नयन ! स्मितपूर्ण मुख ! सदैव आंख और अंतर के सामने ही रहते हैं । सुबह संथारे में से उठू, प्रतिक्रमण करूं और याद शुरु । संथारे में सोता हूं लेकिन नींद नहीं आती । न भूलाते है, न विस्मृत होते है । ___ दो दिन सतत और सख्त आवन-जावन और भारी कार्यवाही की वजह से हृदय पर पत्थर रखकर सभी कर्तव्य निभाया, किन्तु मन जब कार्यों से निवृत्त होता है, उसी वक्त रुदन शुरु हो जाता है । मेरे हृदय में से कुछ चला गया हो ऐसा लगता है, शून्य हो गया हृदय और मस्तिष्क में सतत गुरुदेव ही है, फिर भी पूज्यश्री की दृष्टि विषयक अनुपस्थिति हृदय-मस्तिष्क को शून्य बना देती है । कौन मुझे 'कल्पतरु' कहेगा ? 35
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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