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________________ वांकी (कच्छ) चातुर्मास प्रवेश, वि.सं. २०५५ १-८-१९९९, रविवार श्रा. व. ४ ४ जैन - शासन में आज भी श्रेष्ठता कायम है जिसका कारण है गीतार्थ जिनाज्ञा का पालन कर रहे हैं । आज्ञानुसार की प्रवृत्ति में शत-प्रतिशत सफलता है, यह आप निश्चित मानें । ✿ मेवाड़ (राजस्थान) में चितौडगढ के विद्वान् के रूप में हरिभद्र भट्ट विख्यात थे । साध्वीजी स्वाध्याय कर रहे थे । संथारा सोने के लिए नहीं, समाधि के लिए है । निगोद में नींद लेने का कार्य तो बहुत किया है । यहां जागृति के लिए उद्यम करना है । आयुष्य दर्भाग्रस्थ जलबिन्दु तुल्य है, यह जानते हुए भी मुनि प्रमत्त कैसे होगा ? साधु सदा अप्रमत्तता के लिए ही स्वाध्याय में लीन रहते है । स्वाध्याय कर रही साध्वीजी के ये उद्गार हरिभद्र के कानों में पड़े : 'चक्किदुगं हरिपणगं' । अर्थ समझ में नहीं आया । अहं को टक्कर लगी । ज्यों ज्यों ज्ञानी अध्ययन करता है, पठन करता है, त्यों त्यों उसे लगता है कि मेरा कितना घोर अज्ञान था ? जो अज्ञान का ज्ञान कराये वही सच्चा ज्ञान है । हरिभद्र भट्ट अर्थ समझने के लिए साध्वीजी के पास गये, तब कहे कलापूर्णसूरि १ ***** **** १०५
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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