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________________ * शास्त्र अन्य व्यक्तियों की परीक्षा के लिए नहीं है, स्व के निरीक्षण के लिए है । यदि अन्य व्यक्तियों के दोष देखते रहे तो शास्त्र आपके लिए शस्त्र है ।। • मेरा स्वास्थ्य भले ठीक न हो, परन्तु वाचना आदि से उल्टा अधिक स्फूर्तिमय रहता है । आप ग्रहण करें और जीवन में उतार कर विनियोग करें । कृपण न बनें । अपनी ज्ञान-सम्पत्ति-अध्यात्म-सम्पत्ति यदि हम दूसरों में वितरित नहीं करेंगे तो सानुबन्ध नहीं बनेगी, भवान्तर में प्राप्त नहीं होगी । जैन-शासन किस लिए जयवंत है ? क्योंकि विनियोग की प्रक्रिया चालु रही है। नैयायिक पण्डित क्लिष्ट भाषा में लिखते हैं, ताकि कोई बात समझ ही न सके, जबकि जैनाचार्यों ने सरल भाषा में लिखा है। सभी समझें, ग्रहण करें, जीवन में उतारें, यह विनियोग है । २०. 'भक्तिर्भगवति धार्या' भगवान पर भक्ति धारण करनी । इतने गुण आ गये हैं, अब भक्ति की क्या आवश्यकता है? भक्ति नहीं होगी तो ये समस्त गुण अभिमान उत्पन्न करेंगे । अभिमान आया तो समझ लेना कि पतन का प्रारम्भ हो गया है । बत्तीस-बत्तीसी में तो यहां तक कहा है कि - सारमेतन्मया लब्धं, श्रुताब्धेरवगाहनात् । भक्तिर्भागवती बीजं, परमानन्द - सम्पदाम् ॥ 'समग्र शास्त्रनो सार, मेळव्यो में मथी मथी; परमानंदनी प्राप्ति, थाय छे प्रभु-भक्तिथी.' भगवान अन्य कुछ नहीं मांगते । केवल समर्पण मांगते है । वह भी अपने लिए नहीं, भक्त के लिये । अपने स्वयं के लिए भगवान को नमन, पूजन, समर्पण अथवा भक्ति की आवश्यकता नहीं है। भक्त के लिए यह सब आवश्यक . सम्यग्दर्शन, मैत्री एवं भक्ति की नींव पर खड़ा है । इससे मधुर परिणाम प्राप्त होता है । इससे पूर्व नीम की कटुता मात्र होती है । कहे १****************************** ९१
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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