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________________ GOOOOOoooaan तुरन्त 'रिवोल्वर' में ठा ... ठा ... ठा ... तीन गोलियों की आवाज आई। गोली दागने वाली अन्य कोई नहीं, रमेश की एक समय की प्रियतमा सलमा उर्फ साधना ही थी, जिसने अपने प्रियतम रमेश को गोलियों से भून दिया था। रमेश की देह तुरन्त लुढ़क गई और उसके प्राण पखेरू उड़ गये। सिपाहियों ने दौड़कर साधना को गिरफ्तार कर लिया। उसके चहरे पर तनिक भी शोक अथवा उदासी नहीं थी। वह मुस्कराती हुई बोली, "अब चाहे मेरा कुछ भी हो, मुझे उसका तनिक भी खेद नहीं है। मैंने उसका काम तमाम कर दिया और मेरा कार्य पूर्ण हो गया। ऐसे मूखों के साथ जीवन यापन करने की अपेक्षा तो उन्हें मृत्यु के मुँह में ही झौंक देना चाहिये और इस कारण ही मैंने ऐसा किया है।" बताइये-रमेश को क्यों मरना पड़ा? माता-पिता के आशीर्वाद के बिना उसने एक ऐसी अयोग्य एवं नीच कुल की लड़की को पसन्द किया था, जिसने उसका जीवन मिट्टी में मिला दिया। ___ नीच कुल के व्यक्ति के साथ विवाह करने से कैसा भयंकर परिणाम होता है उसका इस कथा से हमें अच्छा आभास होता है। नाथालाल के जीवन को नष्ट करने वाली सरला नीच रक्त का व्यक्ति पता नहीं कब अपना पोल खोल दे, उसका कोई विश्वास नहीं होता। नाथालाल ने ऐसी ही किसी आभागन स्त्री के साथ विवाह कर लिया था। भाग्य ने उसे ऐसी नीच स्त्री के साथ बाँध दिया था। नाथालाल था तो निर्धन, परन्तु भाग्यवश सट्टा करते-करते वह रातों-रात लाखों रुपयों का स्वामी हो गया था। सट्टे की लत में वह ऐसा पड़ा कि कुछ न पूछो। ज्यों ज्यों वह लाभ अर्जित करता गया, त्यों त्यों उसके लोभ में वृद्धि होती गई। अनेक कपटी मित्रों ने उसे चारों ओर से घेर लिया था। एक समय ऐसा आया कि नाथालाल जुए में हारता ही गया, हारता ही गया। धीरे-धीरे उसने अपनी समस्त सम्पत्ति खो दी। अपनी पराजय को विजय में परिवर्तित करने के लिये वह जुआ खेलता ही गया और अन्त में लाखों रुपयों का ऋण ऊपर आने पर वह हताश हो गया। घर की ओर जाते हुए नाथालाल का चहरा उतर गया था। उसके पाँव शराबी की तरह लड़खड़ा रहे थे। ऋण नहीं चुका सकने पर अपनी प्रतिष्ठा समाप्त हो सकती थी। वह व्याकुल था, समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाये? इतने में उसे किसी बात का स्मरण हो आया और वह खुश-खुश हो गया। उसे अपनी पत्नी के आभूषणों का स्मरण हुआ। सस्ते भाव के समय उसने अपनी पत्नी सरला को एक लाख रूपयों के आभूषण बनवा कर दिया थे। नाथालाल ने सोचा, "सरला को मेरे प्रति अनन्य प्रेम है,
SR No.032476
Book TitleMangal Mandir Kholo
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevratnasagar
PublisherShrutgyan Prasaran Nidhi Trust
Publication Year
Total Pages174
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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