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________________ ४८ ] . [ कर्मप्रकृति पतद्ग्रह में संक्रांत होता है। . एक सौ दो प्रकृतियों की सत्ता वाले जीव के पूर्वोक्त तेरह प्रकृतियों के क्षय हो जाने पर अठासी प्रकृतिरूप संक्रमस्थान एक प्रकृतिक पतद्ग्रह में संक्रांत होता है। छियानवै प्रकृति की सत्ता वाले जीव के नामकर्म की पूर्वोक्त तेरह प्रकृतियां क्षय हो जाने पर बियासी प्रकृतिक संक्रमस्थान और पंचानवै प्रकृतियों की सत्ता वाले जीव के नाभकर्म की तेरह प्रकृतियों के क्षय हो जाने पर इक्यासी प्रकृतिक संक्रमस्थान एक यश कीर्ति प्रकृतिरूप पतद्ग्रहस्थान में संक्रांत होता है। इस प्रकार एक प्रकृतिक पतद्ग्रहस्थान में संक्रांत होने वाले आठ संक्रमस्थान जानना चाहिये - १०२, १०१, ९५, ९४, ८९, ८८, ८२, ८१ प्रकृतिक। इकतीस प्रकृतिक पतद्ग्रहस्थान में जो चार संक्रमस्थान संक्रांत होते हैं, वे इस प्रकार हैं - यति-अप्रमत संयत और अपूर्वकरण संयत के देवगति पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियअंगोपांग, देवानुपूर्वी, पराघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश कीर्ति, तैजसकार्मण शरीर, वर्णादिचतुष्क, अगुरुलघु, उपघात, निर्माण, तीर्थंकर और आहारकद्विक रूप इकतीस प्रकृतियों को बांधते हुये इस इकतीस प्रकृतियों के समुदाय रूप पतद्ग्रह स्थान में एक सौ तीन, एक सौ दो, छियानवै और पंचानवै प्रकृतिक चार संक्रमस्थान संक्रांत होते हैं। जिनका स्पष्टीकरण निम्न प्रकार है - एक सौ तीन प्रकृतिक संक्रमस्थान तीर्थंकर और आहारकद्विक की बंधावलिका के बीत जाने पर "इकतीस प्रकृतिक पतद्ग्रह में संक्रांत होता है, किन्तु तीर्थंकर नामकर्म की बंधावलिका के नहीं बीतने पर एक सौ दो प्रकृतिक संक्रमस्थान संक्रांत होता है। आहारकसप्तक' की बंधावलिका के नहीं बीतने पर छियानवै प्रकृतिक संक्रमस्थान इकतीस प्रकृतिक पतद्ग्रह में संक्रांत होता है तथा तीर्थंकर और आहारकसप्तक की बंधावलिका के नहीं बीतने पर पंचानवै प्रकृतिक संक्रमस्थान इकतीस प्रकृतिक पतद्ग्रहस्थान में संक्रांत होता है। तीस और उनतीस प्रकृतिक पतद्ग्रह स्थानों में संक्रांत होने वाले संक्रम स्थान इस प्रकार हैं - एगतंसेढिजोगे इत्यादि अर्थात् जो संक्रमस्थान एकान्त रूप से श्रेणी के ही योग्य हैं, ऐसे एक सौ १. तीर्थकर नाम का बंध प्रारम्भ होने से १०३ प्रकृति की सत्ता तो हुई, किन्तु बंधावलिका सर्वकरणासाध्य होने से वह एक आवलिका तक संक्रमित नहीं होने से १०२ प्रकृतियों का संक्रम कहा है। २. सत्ता की अपेक्षा यहां आहारकसप्तक का उल्लेख किया है। अन्यथा बंधापेक्षा तो आहारकद्विक कहना चाहिये।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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