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________________ संक्रमकरण ] कम दो आवलिकाकाल तक संक्रांत होती रहती हैं । इसके पश्चात् संज्वलन क्रोध के उपशांत हो जाने पर शेष दस प्रकृतियां उसी पतद्ग्रहपंचक में अन्तर्मुहूर्तकाल तक संक्रांत होती रहती हैं । [ २७ तदनन्तर संज्वलनमान की प्रथम स्थिति में एक समय कम तीन आवलिकाकाल शेष रह जाने पर संज्वलनमान भी पतद्ग्रह नहीं रहता है । इसलिये पतद्ग्रहपंचक में से उसे न्यून कर देने पर शेष चतुष्क रूप पतद्ग्रह में वे ही पूर्वोक्त दस प्रकृतियां संक्रात होती हैं । वे प्रकृतियां तब तक संक्रांत होती रहती हैं जब तक एक समय कम दो आवलिकाकाल पूर्ण होता है । तत्पश्चात् अप्रत्याख्यानावरण प्रत्याख्यानावरण रूप मान के उपशांत हो जाने पर शेष आठ प्रकृतियां चतुष्क रूप पतद्ग्रहस्थान में ही संक्रांत होती हैं । तदनन्तर संज्वलनमान के उपशांत हो जाने पर सात प्रकृतियां संक्रांत होती हैं और वे सातों प्रकृतियां चतुष्करूप पतद्ग्रह में अन्तर्मुहूर्तकाल तक संक्रांत होती रहती हैं । तत्पश्चात् संज्वलनमाया की प्रथम स्थिति एक समय कम तीन आवलिकाल शेष रह जाने पर संज्वलनमाया पतद्ग्रह नहीं रहती है । इसलिये उसे पूर्वोक्त पतद्ग्रहचतुष्क में से निकाल देने पर शेष त्रिक रूप पतद्ग्रहस्थान में पूर्वोक्त सात प्रकृतियां संक्रांत होती हैं और वे एक समय कम दो आवलिकाल तक संक्रांत होती रहती हैं । तत्पश्चात् अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण रूप मायाद्विक के उपशांत हो जाने पर शेष पांच प्रकृतियां त्रिक रूप पतद्ग्रह में संक्रांत होती हैं और वे भी तब तक जब तक कि एक समय कम दो आवलिकाल पूर्ण होता है । तत्पश्चात् संज्वलनमाया के उपशांत हो जाने पर शेष चार प्रकृतियां संक्रांत होती हैं और वे अन्तर्मुहूर्तकाल तक संक्रांत होती रहती हैं। तत्पश्चात् अनिवृतिबादर संपरायगुणस्थान के चरम समय में अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण रूप लोभद्विक के उपशांत हो जाने पर शेष रही मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये दो प्रकृतियां संक्रांत होती हैं । किन्तु ये दोनों संज्वलन लोभ में संक्रांत नहीं होती हैं। क्योंकि दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय का परस्पर संक्रम नहीं होता है । इसलिये उसके ( संज्वलनलोभ के भी पतद्ग्रहता नहीं होती है, जिससे वे दोनों (मिथ्यात्व और मिश्र मोहनीय) ही उन दोनों में (मिश्र और सम्यक्त्व मोहनीय में) संक्रमित होती हैं । अर्थात् मिथ्यात्व का संक्रमण सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व में तथा सम्यग्मिथ्यात्व का सम्यक्त्व प्रकृति में संक्रम होता है । इस प्रकार औपशमिक सम्यग्दृष्टि की उपशमश्रेणी में संक्रम और पतद्ग्रह की विधि जानना चाहिये। जिसका सरल सुबोध श्रेणी में स्पष्टीकरण निम्नलिखित प्रारूप में किया जा रहा है
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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