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________________ [ कर्मप्रकृति पूर्वोक्त पुरुषवेद आदि पाँच प्रकृति के संक्रमण का कथन अंतरकरण की अवस्था की दृष्टि से है, लेकिन ‘अन्नत्थ इति' अर्थात् अंतरकरण के सिवाय अन्यत्र पुरुषवेद आदि पाँचों प्रकृतियों का भी और शेष प्रकृतियों का' 'सव्वहिंति' अर्थात् सभी अवस्था विशेष में - अन्तरकरण की अवस्था के सिवाय शेष सभी अवस्थाओं में सर्व प्रकारों से यानि क्रम और अक्रम से संक्रमण जानना चाहिये। प्रश्न – क्या उक्त दोनों प्रकार का संक्रम सदैव - सव्वहा समझना चाहिये ? उत्तर – नहीं। किन्तु बंधे – बंधकाल में ही विवक्षित प्रकृति का संक्रम होता है, अन्य काल में नहीं जैसा कि पूर्व में कहा गया है। इस प्रकार संक्रम का सामान्य लक्षण विधान और अपवाद नियम जानना चाहिये। अब पूर्व में जो पतद्ग्रह विषयक अपवाद कहा गया था कि जिस प्रकृति का बंध होता है, वह प्रकृति अन्य प्रकृति के दलिकों के संक्रमण के प्रति पतद्ग्रह है, इस विषय में जो अपवाद हैं उन्हें कहते हैं - तिसु आवलियासु समऊणियासु अपडिग्गहा उ संजलणा। दुसु आवलियासु पढमठिईए सेसासु वि य वेदो॥५॥ शब्दार्थ - तिसु - तीन, आवलियासु - आवलिका, समऊणियासु - समय न्यून, अपडिग्गहा - अपतद्ग्रह (पतद्ग्रह नहीं), संजलणा – संज्वलन चतुष्क, दुसु - दो, आवलियासुआवलिका, पढमठिईए - प्रथम स्थिति में, सेसासु – शेष रहने पर, वि - भी, य - और, वेदोवेद में। गाथार्थ – अन्तरकरण करने के बाद एक समय कम तीन आवलिका प्रमाण प्रथम स्थिति शेष रहने पर संज्वलनचतुष्क तथा प्रथम स्थिति में एक समय दो आवलिका प्रमाणकाल शेष रहने पर पुरुषवेद भी अपतद्ग्रह है अर्थात् पतद्ग्रह रूप नहीं होता है। विशेषार्थ – अन्तरकरण करने पर प्रथम स्थिति में एक समय कम तीन आवलिकाओं के शेष रह जाने पर चारों ही संज्वलन कषायें अपतद्ग्रह हैं अर्थात् पतद्ग्रह नहीं होती हैं। उक्त कथन का आशय यह है कि चारों ही संज्वलन कषायों की प्रथम स्थिति में एक समय कम तीन आवलिकाओं के शेष रहने पर उन प्रकृतियों का बंध होते हुये भी अन्य प्रकृतियों के दलिक उनमें संक्रमित नहीं होते हैं । इसलिये उस समय वे चारों प्रकृतियां अपतद्ग्रह हैं तथा अन्तरकरण १. अर्थात् पुरुपवेद आदि पांच प्रकृतियों सहित शेप रही चारित्रमोहनीय की प्रकृतियों का। २. आशय यह है कि पूर्वानुपूर्वी पश्चानुपूर्वी और अनानुपूर्वी इन तीनों प्रकार का संक्रम युगपत एक समय काल में हो सकता है। ३. इसका कारण यह है कि बंध के अभाव में बंधगर्भित संक्रम लक्षण का ही अभाव है।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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