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________________ ३७० ] [ कर्मप्रकृति कारण इन प्रकृतियों का जो चरम संक्रमण है वही जघन्य स्थितिसत्कर्म है। कहा भी है हासाई पुरिस कोहादि तिन्नि संजलण जेण बंधुदये । वोच्छिन्ने संकमइ तेण इहं संकमो चरिमो ॥१ अर्थात् जिस कारण से हास्यादि छह नोकषाय, पुरुषवेद और क्रोधादि तीन संज्वलन बंध और उदय के विच्छिन्न होने पर अन्य प्रकृति में संक्रान्त होते हैं इसलिये इनका चरम संक्रम ही जघन्य स्थितिसत्व है । उक्त दस प्रकृतियों के अतिरिक्त शेष ज्ञानावरणपंचक दर्शनावरणचतुष्क वेदक सम्यक्त्व, संज्वलन लोभ, आयुचतुष्क, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, सातावेदनीय, असातावेदनीय, उच्चगोत्र, मनुष्यगति, पंचन्द्रियजाति, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय यश: कीर्ति, तीर्थंकरनाम और अंतरायपंचक इन चौतीस प्रकृतियों का अपने-अपने क्षय के अंतिम समय मे जो एक समय मात्र स्थिति है, वही उनका जघन्य स्थितिसत्व है । अनुदयवती प्रकृतियों की अपने-अपने क्षय के उपान्त्य समय मे जो दो समय मात्र काल वाली और स्वरूप की अपेक्षा एक समय प्रमाण काल वाली जघन्य स्थिति है, वह उनका जघन्य स्थितिसत्व है। क्योंकि अनुदयवती प्रकृतियों का चरम समय में स्तिबुकसंक्रमण के द्वारा उदयवती प्रकृतियों के मध्य में प्रक्षेप होता है और इस स्वरूप से उनका अनुभव होता है, इसलिये चरम समय में उन अनुदयवती प्रकृतियों के दलिक स्वरूप से प्राप्त नहीं होते हैं, किन्तु पररूप से प्राप्त होते हैं । इसीलिये कहा है कि उपान्त्य समय में स्वरूप की अपेक्षा समय मात्र स्थिति होती है । अन्यथा दो समय मात्र काल वाली स्थिति होती है । अब सामान्य से सभी कर्मों की जघन्य स्थिति के सत्कर्म का प्रतिपादन करते है - अनन्तानुबंधी कषायों और दर्शनमोहनीयत्रिक के जघन्य स्थितिसत्व के स्वामी यथासंभव अविरत आदि अप्रमत्त पर्यन्त के जीव होते है । नरकायु तिर्यंचायु और देवायु के अपने-अपने आयु के चरम समय में वर्तमान नारक तिर्यंच और देव जघन्य स्थितिसत्व के स्वामी होते हैं । आठ मध्यम कषाय, स्त्यानर्द्धित्रिक, नामत्रयोदशक, नव नोकषाय और संज्वलनत्रिक, इन छत्तीस प्रकृतियों के जघन्य स्थितिसत्व का स्वामी अनिवृत्तिबादरसंपरायसंयत है । संज्वलन लोभ के जघन्य स्थितिसत्व का स्वामी सूक्ष्मसंपरायसंयत, ज्ञानावरणपंचक, दर्शनावरणषट्क और अन्तरायपंचक, इन सोलह प्रकृतियों के जघन्य स्थितिसत्व का स्वामी क्षीणकषायवीतराग छद्मस्थ है। शेष पंचानवै प्रकृतियों १. पंच संग्रह पंचम द्वार सत्ताधिकार गा. १४७
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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