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________________ सत्ताप्रकरण ] [ ३६७ बंधपरक प्रकृतियां कहलाती हैं। ये अनुदय बंधपरक प्रकृतियां बीस हैं – निद्रापंचक, नरकद्विक, तिर्यचद्विक औदारिकसप्तक, एकेन्द्रियजाति सेवार्तसंहनन, आतप और स्थावर। इन अनुदय बंधपरक बीस प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिसत्व एक समय कम उत्कृष्ट स्थिति प्रमाण होता है। वह इस प्रकार है- इन प्रकृतियों के उत्कृष्ट स्थितिबंध के प्रारम्भ में यद्यपि अबाधा काल में भी पूर्वबद्ध दलिक होते हैं, तथापि उनकी प्रथम स्थिति को उदयवाली प्रकृतियों के मध्य में स्तिबुकसंक्रम से संक्रान्त करता है। इसलिये उस एक समय प्रमाणवाली प्रथम स्थितियों से ही उत्कृष्ट स्थितिसत्व होता है। प्रश्न – निद्रा आदि प्रकृतियों के उदय नहीं होने पर बंध से उत्कृष्ट स्थिति कैसे प्राप्त होती है ? उत्तर – उत्कृष्ट संक्लेश होने पर ही उत्कृष्ट स्थितिबंध होता है। किन्तु उत्कृष्ट संक्लेश में वर्तमान जीव के निद्रापंचक का उदय संभव नहीं है। इसी प्रकार नरकद्विक का उत्कृष्ट स्थितिबंध तिर्यंच अथवा मनुष्य करते हैं। किन्तु उन तिर्यंचों या मनुष्यों के नरकद्विक का उदय संभव नहीं है। शेष कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति का बंध यथायोग्य देव अथवा नारक करते है। किन्तु उनमें भी इन प्रकृतियों का उदय घटित नहीं होता है। इसलिये निद्रा आदि प्रकृतियों के उदय नहीं होने पर भी बंध से उत्कृष्ट स्थिति पाई जाती है, तथा – संकमओ दीहाणं, सहालिगाए उ आगमो संतो (तं)। समऊणमणुदयाणं, उभयासिं जट्ठिई तुल्ला॥ १८॥ शब्दार्थ – संकमओ – संक्रम से, दीहाणं - दीर्घ स्थिति वाली, सहालिगाए - आवलिका, सहित, उ - किन्तु, आगमो - आगम, संतो - सत्व, समऊणं – समयोन, अणुदयाणं- अनुदयवती की, उभयांसि - दोनों प्रकार की, जट्ठिइ – यत्स्थिति, तुल्ला - तुल्य। गाथार्थ – संक्रम से दीर्घ स्थिति वाली प्रकृतियों का आवलिका सहित आगम उत्कृष्ट स्थितिसत्व है। किन्तु अनुदयवती प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिसत्व पूर्वोक्त स्थिति में से समयोन जानना चाहिये और उभय प्रकार की प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिसत्व यत्स्थिति के तुल्य होता है। विशेषार्थ – संक्रमण से जिन प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिसत्व पाया जाता है, किन्तु बंध से नहीं पाया जाता है, परन्तु उदय होता है, वे प्रकृतियां संक्रम से दीर्घ अर्थात् संक्रमण के वश से प्राप्त उत्कृष्ट स्थितिवाली कहलाती हैं। उन प्रकृतियों का जो आगमन अर्थात् संक्रमण से दो आवलिका हीन उत्कृष्ट स्थिति का समागम है, वह उदयावलिका रूप आवलिका सहित उन प्रकृतियों
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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