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भगवती सूत्र
श. १ : उ. ४ : सू. १८५-१९० १८५. भन्ते! क्या वह वीर्य-भाव में अपक्रमण करता है? अवीर्य-भाव में अपक्रमण करता
गौतम! वह वीर्य-भाव में अपक्रमण करता है, अवीर्य-भाव में अपक्रमण नहीं करता। १८६. यदि वह वीर्य-भाव में अपक्रमण करता है, तो क्या बाल-वीर्य-भाव में अपक्रमण करता है? पंडित-वीर्य-भाव में अपक्रमण करता है? बाल-पंडित-वीर्य-भाव में अपक्रमण करता है? गौतम! वह बाल-वीर्य-भाव में अपक्रमण नहीं करता, पंडित-वीर्य-भाव में अपक्रमण नहीं करता, बाल-पंडित-वीर्य-भाव में अपक्रमण करता है। १८७. भन्ते! क्या वह अपक्रमण आत्मना (अपने आप) करता है? अनात्मना (परनिमित्त से)
करता है? गौतम! वह आत्मना अपक्रमण करता है, अनात्मना अपक्रमण नहीं करता। मोहनीय कर्म का वेदन करता हुआ अपक्रमण करता है। १८८. भन्ते! वह मोहनीय-कर्म का वेदन करता हुआ अपक्रमण कैसे करता है?
गौतम! अपक्रमण से पूर्व वह जो तत्त्व जैसा है, उस पर वैसी ही रुचि करता है। अब (मोहनीय-कर्म के उदय-काल में) वह जो तत्त्व जैसा है, उस पर वैसी रुचि नहीं करता-इस प्रकार वह मोहनीय-कर्म का वेदन करता हुआ अपक्रमण करता है। कर्ममोक्ष-पद १८९. भन्ते! नैरयिक, तिर्यग्योनिक, मनुष्य अथवा देव के जो किया हुआ पाप कर्म है, क्या उसका वेदन किए बिना मोक्ष (छुटकारा) नहीं होता?
हां, गौतम! नैरयिक, तिर्यग्योनिक, मनुष्य अथवा देव के जो किया हुआ पाप कर्म है, उसका वेदन किए बिना मोक्ष नहीं होता। १९०. भन्ते! यह किस अपेक्षा से कहा जा रहा है नैरयिक, तिर्यग्योनिक, मनुष्य अथवा देव के जो किया हुआ पाप कर्म है, उसका वेदन किए बिना मोक्ष नहीं होता? गौतम! मैंने दो प्रकार के कर्म बतलाए हैं, जैसे–प्रदेश-कर्म और अनुभाग-कर्म।। जो प्रदेश-कर्म है, उसका नियमतः वेदन होता है। जो अनुभाग-कर्म है, उसमें से किसी का वेदन होता है, किसी का वेदन नहीं होता। यह अर्हत् के द्वारा ज्ञात है, श्रुत है और विज्ञात है-यह जीव इस कर्म का आभ्युपगमिकी (स्वीकृत) वेदना द्वारा वेदन करेगा और यह जीव इस कर्म का औपक्रमिकी (प्रयत्नकृत) वेदना द्वारा वेदन करेगा। यथाकर्म (बद्ध कर्मों के अनुसार) और यथानिकरण (विपरिणमन के नियत हेतु के अनुसार) जैसे-जैसे वह कर्म भगवान् ने देखा, वैसे-वैसे उसका विपरिणमन होगा। गौतम! इस अपेक्षा से यह कहा जा रहा है नैरयिक, तिर्यग्योनिक, मनुष्य अथवा देव के जो किया हुआ पापकर्म है, उसका वेदन किए बिना मोक्ष नहीं होता।
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