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श. १ : उ. ३ : सू. १३९-१४९
भगवती सूत्र लिए ‘इह' (समीपवर्ती पर्याय) गमनीय है? जैसे तुम्हारे लिए ‘इह' गमनीय है, वैसे ही क्या तुम्हारे लिए 'अत्र' गमनीय है? हां गौतम! जैसे मेरे लिए 'अत्र' गमनीय है, वैसे मेरे लिए ‘इह' गमनीय है। जैसे मेरे लिए 'इह' गमनीय है, वैसे मेरे लिए 'अत्र' गमनीय है। कांक्षामोहनीय का बंध आदि-पद १४०. भन्ते! क्या जीव कांक्षामोहनीय-कर्म का बंध करते हैं?
हां, करते हैं। १४१. भन्ते! जीव कांक्षामोहनीय-कर्म का बंध किस हेतु से करते हैं?
गौतम! उसका प्रत्यय-हेतु (परिणामी कारण) प्रमाद और निमित्त-हेतु योग (मन, वचन और काया की प्रवृत्ति) है। १४२. भन्ते! प्रमाद किससे उत्पन्न होता है?
गौतम! प्रमाद योग से उत्पन्न होता है। १४३. भन्ते! योग किससे उत्पन्न होता है?
गौतम! योग वीर्य से उत्पन्न होता है। १४४. भन्ते! वीर्य किससे उत्पन्न होता है?
गौतम! वीर्य शरीर से उत्पन्न होता है। १४५. भन्ते! शरीर किससे उत्पन्न होता है?
गौतम! शरीर जीव से उत्पन्न होता है। १४६. ऐसा होने पर उत्थान, कर्म, बल, वीर्य, और पुरुषकार-पराक्रम का अस्तित्व सिद्ध होता
१४७. भन्ते! क्या जीव अपने आप ही उदीरणा करता है? अपने आप ही गर्दा करता है?
अपने आप ही संवरण करता है? हां, गौतम ! जीव अपने आप ही उदीरणा करता है, अपने आप ही गर्दा करता है और अपने
आप ही संवरण करता है। १४८. भन्ते! जीव अपने आप ही जो उदीरणा करता है, अपने आप ही जो गर्दा करता है,
अपने आप ही जो संवरण करता है, वह क्या-१. उदीर्ण (उदय-प्राप्त) की उदीरणा करता है? २. अनुदीर्ण की उदीरणा करता है? ३. अनुदीर्ण किन्तु उदीरणायोग्य कर्म की उदीरणा करता है? ४. अथवा उदय के अनन्तर पश्चात्कृत (भुक्त) कर्म की उदीरणा करता है? गौतम! जीव १. उदीर्ण की उदीरणा नहीं करता। २. अनुदीर्ण की उदीरणा नहीं करता। ३. अनुदीर्ण किन्तु उदीरणायोग्य कर्म की उदीरणा करता है। ४. उदय के अनन्तर पश्चात्कृत कर्म
की उदीरणा नहीं करता। १४९. भन्ते! जीव अनुदीर्ण किन्तु उदीरणायोग्य कर्म की जो उदीरणा करता है, वह क्या
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