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जैनधर्म की कहानियाँ भाग-६/१०६ भावों में अपना स्वाधीन-कर्तृत्व जानकर, उन्होंने पर के साथ एकत्व का अध्यास छोड़ दिया था और अपने आत्मा के एकत्व का अनुभव करते हुए स्वाधीनरूप से अपने मोक्ष के ही कर्ता होते थे।
भेदज्ञान द्वारा मोक्षमार्ग में प्रविष्ट वे मुमुक्षु-महात्मा ऐसा जानते थे कि
"जब मैं संसारी था, अज्ञानी था, तब भी वास्तव में मेरा कोई भी नहीं था; तब भी मैं अकेला ही अपने मलिन चैतन्यभाव द्वारा कर्ता-करणादि होकर स्वभावसुख से विपरीत ऐसे दुःखफल को उत्पन्न करता था, उसमें दूसरा कोई मेरा सम्बन्धी नहीं था और अब, साधकदशा में जिसे सुविशुद्ध सहज स्वपरिणति प्रगट हुई है ऐसा मैं एकान्त से मुमुक्षु हूँ; वर्तमान में इस मुमुक्षु-साधक-ज्ञानदशा में भी मैं अकेला ही अपने सुविशुद्ध चैतन्यभाव द्वारा कर्ता-करणादि होकर, मैं अकेला ही अपने स्वभाव द्वारा अनाकुल सुख उत्पन्न करता हूँ। इस समय भी वास्तव में मेरा कोई भी नहीं है और मोक्ष में भी मैं अकेला ही सादि-अनन्तकाल अपने एकत्व स्वरूप में रहकर अतीन्द्रिय आनन्दमय जीवन जिऊँगा।" __इसप्रकार बंधमार्ग में या मोक्षमार्ग में, दु:ख में या सुख में, संसार में या मोक्ष में आत्मा अकेला ही है - ऐसे आत्मा के एकत्व को जानकर, उस एकत्व की भावना में तत्पर रहने वाले प्रभु को परद्रव्य का किंचित् भी सम्पर्क न रहने से शुद्धता थी, तथा कर्ता-कर्म-करण-फल इन समस्त भावों को एक अभेद आत्मारूप अनुभवते, भाते होने से पर्यायों द्वारा खण्डित नहीं होते थे, इसलिये सुविशुद्ध ही रहते थे; आत्मा की पर्यायों को आत्मद्रव्य में ही प्रलीन करके सुविशुद्ध आत्मा को उपलब्ध करते थे। इसप्रकार अपने आत्मा को पर से विभक्त करके सुविशुद्ध आत्मा को उपलब्ध करते थे। उन्होंने अपने आत्मा को पर से विभक्त करके स्वतत्त्व के एकत्व में लगाया - वही शुद्धनय है, वही शुद्धात्मा की उपलब्धि है, वही निर्वाण का मार्ग है, वही महा अतीन्द्रिय सुख है तथा वही महावीर का जीवन है।
अहो ! ऐसा स्वभावरूप परिणमित चैतन्यतत्त्व जगत में सर्वोत्कृष्ट सुन्दर वस्तु है। चैतन्यतत्त्व की सुन्दरता जहाँ अनुभव में आती है वहाँ जगत का अन्य कोई पदार्थ सुन्दर नहीं लगता, कहीं सुखबुद्धि नहीं होती, सर्वत्र उदासीनवृत्ति रहती है। - ऐसी शान्त सहज दशा स्वयं आनन्दरूप है और उसमें वीरनाथ प्रभु