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________________ जैनधर्म की कहानियाँ भाग - ३ / ११ एक था बंदर एक था बंदर ! वह पूर्वभव में मनुष्य था, परन्तु उस समय उसने अपनी आत्मा को ना समझकर बहुत छल-कपट किया, वहाँ से मरकर बंदर हुआ । वह बंदर एक वन में रहता था। बंदर भाई वन में रहकर खूब फलफूल खाता । एक झाड़ से दूसरे झाड़ पर उछल-कूद करता। ऊँची-ऊँची छलाँग मारकर हूआ - हूआ करके डराता । उस वन में कई बार मुनिराज आते और झाड़ के नीचे ध्यान में बैठे हुए मुनिराज को देखकर बंदर बहुत खुश होता और तब वह उस झाड़ के ऊपर ऊधम नहीं मचाता । एक बार उस वन में एक राजा और रानी आये। राजा का नाम वज्रजंघ था और रानी का नाम श्रीमती । उन राजा के दो पुत्र जो मुनि हो गये थे, वे मुनि उस वन में आ पहुँचे। तब राजा-रानी ने उन दोनों मुनिवरों को भक्ति-भाव से आहारदान दिया ।
SR No.032252
Book TitleJain Dharm Ki Kahaniya Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHaribhai Songadh, Swarnalata Jain, Rameshchandra Jain
PublisherAkhil Bharatiya Jain Yuva Federation
Publication Year2013
Total Pages84
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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