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________________ ~ श्री प्राचीनस्तवनावली . . . . [७९ चीकर सरदहुंरे, सवल विमासणा ए होरे ॥ १॥ चंद्रानन जिन । कीजे कवण प्रकाशेरे । इण दुःषमआरे। में लीधो अवतारोरे ॥ च० ॥२॥ आगम बल तेहवो नहीं रे, संशय पड़ असदिव । सूधी समझ न को पड़े रे, भारी कर्मोरो जीवोरे ॥ चं०॥३॥ इष्ट रागराता अछेरे, केहने पूंछं जाय। आपणपो थापे सहुरे, तिणमो मनड़ो लायोरे॥ चं० ॥ ४॥ विहरमान जिन साँभलोरे। खरिय मिलण मनखंत होवे दरसन जिनराजनोरे, तो भांजे मन भ्रांतोरे ॥ चं०॥५॥ ॥ढाल १३ मी॥ ॥ आयो म्हारी संहिया गच्छपति ए राह ॥ जोवो म्हारी आई उण दिश चालतो है ॥ कागलियो लखदीजे हो । अंतरजामी थी अलगा रह्या हे, कागळयाहि कीजे हे ॥ जो०॥१॥ साहिबीयो तो छे वैरागीयो हे, फेर जबाब न देसे है, पण प्रभुनी सेवामाहे रह्या है। सहिजे काज सरे
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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