SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 58
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री प्राचीनस्तवनावली . . . . [४३ ॥ कलश ॥ इम विमलगिरिवर मौलि मंडण आदि जिनवर संथुण्यो । अट्ठारेसे छासठ माधव, शुक्ल द्वितीया गुण भण्या। श्रीमंत अमृत धर्मवाचक शिष्य निज मनमें धरथा । इण परे क्षमा कल्याण पाठक आत्मगुण निर्मल करथा ॥ ॥ श्री समयमुन्दरजी कृत पोषधवतनो स्तवन ॥ ॥दोहा॥ जेसलमेर नगर भलो, जिहां श्री पार्श्वजिणंद। प्रह उठी नित प्रणमता, आपे परमाणंद ॥१॥ तासु चरण प्रणमी करी, पौषध विधि विस्तार । पभणिसुंश्रावक हित भणि, आगमने अनुसार॥२॥ पोसो पोसो सहु करे, पोसो करे सहु कोय। पिए पोसा विध सांभलो, जिम निस्तारो होय ॥३॥ ॥ढाल॥ ॥ प्रभु प्रणमुरे, पार्श्वजिनेश्वर थंभणा ॥ए राह ॥ पहिले दिनरे, सांज समे उपगरण सहु,
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy