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________________ uuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuuu २२] . . . . श्री प्राचीनस्नवनावली ॥एकादशी-श्रीमल्लिनाथजीरो स्तवन ॥ नवपदसमरी मन सुधे,वलि गौतम गणधार। सरस्वति माता चित्त धरूं, वाधे वचन उदार ॥१॥ मल्लिनाथ उगणीसमां, जिनवर जगमें जेह । गुण गाइश हुं तेहना, सुगुण सुणो धरी नेह ॥२॥ किण देशे किण नगरमें, कवण पिता कुण माय। पंचकल्याणक परगड़ा, विगत करि कहुं वात॥३॥ ॥ ढाल १ ली॥ रामचंद्रके वाग आंबो मोरी रयोरी ॥ ए देशी. इणहिज जम्बूद्वीप, क्षेत्र भरत सुखकारी। नयरी मिथुला नाम, अलिका ने अनुहारी ॥४॥ तिहा नृप कुम्भ कहाय, राणी प्रभावती नामे । शीयल गुणे अभिराम, जस पसरयो ठामो ठामे ॥५॥ एक दिवस तिहां नारी, सुता सेज मझारे। देखी चउदे स्वप्न. ते जागी तिण वारी ॥ ६॥ पहोंती पतिने पास, सुपन सहु ते कया। नृप
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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