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१४] . . . . श्री प्राचीनस्तवनावली प्रभु पर कोरणीरे, रत्न जडित सोविसाल ॥ पंचवर्णनी ध्वजा लहलहेरे, नमो अह प्रकास ॥ ॥साहेब०॥४॥
॥ दाल ५ मी॥ __ आभरण ने अति दीपतोरे लाल, सोभे शांतिजिणंद सुखकारीरे। मेरे मनमें थें वसोरेलाल ॥ दिन दिनअधिक आनंद सुख०॥१॥मस्तक मुकट सोहामणोरेलाल॥काने कुंडलदोय सुख॥ बांय बाजुबंद बेरखारे लाल। कंठे नवसरथो हार ॥ सु० ॥२॥ बीयु पासे चवर वीजतारे लाल । सिंहासण सरदार सु०। तीन छत्र शिरे सोभतारे लाल; दशमी पूजा उदार सु०॥३॥दमणो पाडल केतकीरे लाल, राय चंपोराय बेल॥सु०॥विमल शरीर वनमालतीरे लाल, फूलगण अम मेल ॥सु॥४॥ फूलमेल रचीया भलारे लाल,फूल मंडप सुस्नेह-सु०फूल तणा सोहे चन्द्रवारे लाल, फूलांरी वंदरवाल सु०॥५॥ फुला तणा सोभे जुंमकारेलाल॥फुल-तोरणसुस्नेहा॥सु०॥ फूल धरे मन मोहीयोरे लाल, इग्यारमी पुजा एह ॥सु०॥६॥