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गुजरात युनिवर्सिटी, अहमदाबाद द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि के रूप में लेखक द्वारा युनिवर्सिटी प्रांट्स कमिशन, देहली की आर्थिक सहायता से पालि-प्राकृत-विभाग, नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर के तत्त्वावधान में दिनांक २१ से २३ मार्च, १९७७ तक आयोजित "भारतीय संस्कृति के विकास में श्रमण संस्कृति का योगदान" नामक संगोष्ठी में पढ़ा गया एवं “तुलसी-प्रज्ञा" खं-२, ६-४ में प्रकाशित यह लेख किञ्चित् परिवर्तन के साथ
लघु-पुस्तिका के रूप में साभार पुनः प्रकाशित किया जा रहा है।