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________________ तीसरा सर्ग। (सड़क ) से घरको जाऊँगी उस समय तुम मेरा करपल्लव (हाथरूपी पल्लव) पकड़ लेना, और जब पुरवासी लोग इधर उधरसे आआकर कोलाहल मचावे तब तुम उनसे कह देना कि यह मेरी प्रिया है। हे प्रिय ! क्या आप ऐसा करनेको तैयार हैं ? सुलक्षणाके रूपपर आसक्त-चित्त श्रीधरने उसका कहना स्वीकार कर लिया। सच है, कामी जनोंको दुःखका भान ही नहीं होता कि आगे हमें क्या दुःख होगा। एक समय सायंकालमें मतवाले हाथीकी नाई चलनेवाली वह मुग्धा ताबेका पात्र हाथमें लिये जलसे भीगे हुए कुशके द्वारा धरणीतलको सींचती हुई राजमार्गमें होकर जब जा रही थी तब श्रीधर विद्यार्थीने उसके पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया। लोगोंने इधर उधरसे आ-आकर बहुत कोलाहल मचाया और " यह मेरी प्रिया है, इस प्रकार कहनेपर भी उस छात्रको वहाँसे हटा दिया। बाद पहिले संकेतके अनुसार श्रीधर यक्षगृहको चला गया, और वह भी आकुलितमना होती हुई जल्दीसे अपने घरको चली आई। वहाँ उसने अपने पिता आदि सभी बन्धुओंको बुलाया और आंसुओंको बहाते हुए कहा कि हे तात ! आज किसी एक पुरुषने ज़बरदस्ती मेरा हाथ पकड़ लिया है; इस लिये उस पापका प्रायश्चित्त लेनेको मैं अभी जलती हुई आगमें प्रवेश करती हूँ। सुलक्षणाके इन वचनोंको सुनकर पिताने कहा-वत्से! तुम्हारा कैसा स्वभाव है उसको तो मैं अच्छी तरहसे जानता हूँ। दूसरे लोग मात्सर्यके वश हो जो चाहे कहा करें उससे तुम्हें क्या प्रयोजन है ! तुम स्नानादि क्रियाओंमें संलग्ना रहती हुई मेरे घर रहो। सुलक्षणाने कहा कि अब आप लोगअपने 2 बंधुवर्गके साथ अपने 2 घरों
SR No.022754
Book TitlePrabhanjan Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhanshyamdas Jain
PublisherMulchand Jain
Publication Year1916
Total Pages118
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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