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________________ धन्य-चरित्र/47 द्रव्य व्यय कराये जाने पर उसको सात मुख से प्राणहारी ज्वर चढ़ जाता था। उसके देखते हुए अगर कोई दान दे देता था, तो भी उसके सिर में लोगों द्वारा की गयी तीव्र पीड़ा उत्पन्न हो जाती थी। गुणों से मुख्यता रहित तथा धन से मुख्यतावाले उसके द्वारा किसी विवाह आदि अवसर पर स्निग्ध पदार्थ आदि खाये जाने पर अतिसार रोगी की तरह उसका पेट खराब हो जाता था। माला, चन्दन आदि का भोग उसने रोग की तरह छोड़ दिया था। इसलिए स्वजन-वर्ग, कुटुम्ब-वर्ग आदि ने चाण्डाल के कुएँ की तरह उसके साथ आलाप-संलाप का त्याग कर दिया था। ___ एक दिन उस कृपण ने मन में विचार किया-"मेरे पुत्र जवान हो गये हैं। कदाचित् अवसर पाकर मेरा धन ग्रहण न कर लेवें।" इस प्रकार विचार करके छियासठ करोड़ द्रव्य के बदले मणियाँ खरीद लीं। फिर एक बहुत बड़ी खाट बनवायी। उसके चारों पायों को खोखला बनवाकर, उनमें अपने बहुमूल्य रत्न भरकर उसके ऊपर ढ़क्कन लगवाकर लेप आदि से लिप्त कर दिया। जिससे उसमें रहे हुए रत्नादि किसी को दिखायी न पड़े। इस प्रकार की रत्न–गर्भ उस खाट को सबसे छिपाकर बनवाकर सदैव उसी से नव-विवाहिता पत्नी की तरह चिपका रहता। उसे छोड़कर न तो किसी के घर जाता, न उससे नीचे उतरना। खाना-पीना भी उसी पर बैठकर करता। अज्ञान के वश में रहा हुआ घड़ी-मात्र भी उस खाट से दूर नहीं होता था। रात-दिन उसी खाट पर व्यतीत करता था। जो धन के लोभी होते हैं, वे धन में ही आसक्ति को धारण करते हुए प्राण से भी जयादा धन को मानते हैं। पर यह नहीं जानते कि सुरक्षित की गयी लक्ष्मी किसी के साथ नहीं जाती। कहा भी हैअभक्ष्यभक्षणेनशरीररक्षणतत्परं पुरुषं मृत्युर्हसति, अनेकव्यापारेणऽर्जितधनस्य क्षितौ क्षेपपरं पुरुषं धरा हसति, कुलटा वनिता पुत्रलालनतत्परं स्वपतिं हसति। अर्थात् अभक्ष्य के भक्षण से शरीर के रक्षण में तत्पर पुरुष पर मृत्यु हँसती है। कैसे? देखो! संसारियों की मूर्खता! मृत्यु के आने पर शरीर का पोषण करना व्यर्थ है। इसी प्रकार अनेक तरह से व्यापारों द्वारा अर्जित धन को पृथ्वी में छिपानेवाले पर यह धरा हँसती है। कैसे? मूढ़ता तो देखो! मन में तो जानता है कि यह धन कार्यकाल में मेरे भोग के लिए होगा। पर नहीं जानता कि लक्ष्मी भाग्यवानों के भोग के लिए होती है। नहीं जानता कि आगे क्या होनेवाला है। यह धन किसका होगा? कर्मों की गति विचित्र है। अतः धरा हँसती है।
SR No.022705
Book TitleDhanyakumar Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay, Premlata Surana,
PublisherGuru Ramchandra Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages440
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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