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________________ श्री महाबल मलयासुंदरी चरित्र दुःख में वियोगी मिलन ने एक पुराने महल में रखा । वह सारा दिन मलयासुन्दरी ने पतिवियोग में रुदन करते हुए ही पूर्ण किया । जिस मकान में वियोगीनी मलयासुन्दरी को रखा गया था वह राज कैदियों को बंद करने के लिए एक पुराना कारागृह था । उसके पास एक भी दासी नहीं रखी । सिर्फ उस महल के बाहर चारों तरफ राजा के सिपाही घूम रहे थे । रात्रि पड़ने पर चारों तरफ अंधकार पसर गया । मलयासुन्दरी पति दुःख से दुःखित हो जलहीन मीन के समान जमीन पर तड़फने लगी। इसी समय उस जगह कहीं से एक भयंकर जहरी सर्प आ गया और उसने मलयासुन्दरी को डंक लगाया। मृत्यु बुरी चीज है । मलयासुन्दरी एकदम चिल्ला उठी - हाय मेरे पैर में यह दुष्ट सर्प आ लिपटा । यों बोलकर वह देव गुरु का स्मरण करने लगी । चिल्लाहट सुनकर एकदम पहरेदार आ पहुँचे । उन्होंने वहाँ साँप को देखकर उसे किसी शस्त्र से मार डाला और शीघ्र ही जाकर राजा को खबर दी कि मलयासुन्दरी को जहरीले साँप ने डस लिया है । विषय स्नेही राजा यह खबर सुन आकुल व्याकुल हो शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचा । राजा ने तुरन्त ही शहर में से मंत्रवादियों को बुलवाया। जड़ी बूंटी साँप का जहर उतारने के तमाम साधन मंगाये । और उनका प्रयोग भी करवाया परन्तु तमाम प्रयोग निष्फल गये । 1 I सिनेमा टी. वी. एवं विडिओ आदि आधुनिक दुर्गतिदायक साधन मानव को दानव बनाने का कार्य करते हैं । सिनेमा आदि साधन आत्म - गुण घातक नये युग के नये शस्त्र हैं। जयानंद 176
SR No.022652
Book TitleMahabal Malayasundari Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTilakvijay, Jayanandsuri
PublisherEk Sadgruhastha
Publication Year
Total Pages264
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
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