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________________ श्रीउत्तराध्ययनसूत्र ] [ १२३ निःgयहियर ओहरियभरुव भारवहे 'पसत्थज्भाणोवगए सुहं सुहेां विहरइ ॥ १२ ॥ पच्चक्खाणें भन्ते जीवे किं जणयइ ? पश्चक्खा रोग श्रसवदाराई निरुम्भइ । पच्चक्खाणं इच्छा निरोहं जणयइ । इच्छा निरोहं गए य ां जीवे सय्यदव्वेसु विणीयतराहे सीइभूप विहरइ ॥ १३ ॥ थवथुइ मंगले भन्ते ! जीवे किं जणयइ ? थ० नागदंसणचरित्त बोहिलाभं जणयइ | नादंसणच रित्तोहिलाभसंपन्ने य गं जीवे अन्त किरियं कन्यविमाणववत्तिगं श्रार. हणं श्राराहेइ ॥ १४ ॥ काल पडिले हराय ए ग भन्ते ! जीवे किं जणयइ ? कालपडिलेहण्याप णाणावर णिजं कम्मं खवेइ ॥ १५ ॥ Gu पायच्छित्तकरणें भन्ते ! जीवे किं जणयइ ? पा० पावविसोहिं जणयइ, निरइयारे वावि भवइ । सम्मं च णं पायच्छित्तं पडिवजमाणे मग्गं च मग्गफलं च विसोहेइ, श्रयारं च ग्रागारफलं च राइ || १६ || खमावण्याए णं भन्ते ! जीवे किं जणयइ ? ख० पल्हायणभावं जणयइ । पल्हायणभावमुवगए य सव्वपाणभूयजीवसत्तेसु मित्तीभावमुप्पाएइ । मित्तीभावमुवगए य जीवे भावविसोहिं काऊण निभए भवइ ॥ १७ ॥ सज्झाएण भन्ते ! जीवे कि जणयइ ? स० णाणावर णिज्जं कम्मं खबेइ ॥ १८ ॥ १. धम्मन o |
SR No.022614
Book TitleDashvaikalik Tatha Uttaradhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHarshchandra Maharaj
PublisherAtmaram Mohanlal Sheth
Publication Year1949
Total Pages256
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, agam_dashvaikalik, & agam_uttaradhyayan
File Size13 MB
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