SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 5
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पराभव तिरस्कार अपमान करता है, वह विद्या चाहे जितने कष्ट से प्राप्त की हुई हो तो भी निष्फल होती है । थद्धो विजयविहूणो न लहइ कित्तिं जसं च लोगम्मि । जो परिभवं करेइ गुरुण गुरुआइ कम्माणं ॥ ५ ॥ पूर्व कर्म की प्रबलता के कारण जो जीव गुरुका पराभव करता है, वह अभिमानी, विनयहीन जीव जगतमें कहींभी यश या कीर्ति प्राप्त नहीं कर सकता परन्तु (सर्वदा, सर्वत्र, सर्वथा) अपमान को पाता है । सव्वत्थ लभिज्ज नरो विस्सम्भं पच्चयं च कित्तिं च | जो गुरुजणोवइटुं विज्जं विणएण गिणिज्जा ॥ ६ ॥ गुरुजनों से उपदेशित विद्या जो जीव विनय पूर्वक ग्रहण करता है, वह सर्वत्र आश्रय विश्वास और यश-कीर्ति को प्राप्त करता है । अविणीयस्सपणस्स जइ वि न भस्सइ न जुज्जइ गुणेहिं विज्जा सुसिक्खिया वि हु गुरु परिभव बुद्धिदोसेणं ॥ ७ ॥ अविनीत की श्रमपूर्वक प्राप्त विद्या भी गुरुजनों के अपमान करनेकी बुद्धि के दोष से अवश्य नाश- नष्ट होती है । कदाचित सर्वथा नाश न हो तो भी अपना वास्तविक फल देने वाली नहीं बनती । विज्जामणुसरियव्वा न हु दुव्विणीयस्स होइ दायव्वा । परिभवइ दुव्विणीओ तं विज्जं तं च आयरियं ॥ ८ ॥ विद्या बार-बार याद करने योग्य है, संग्रहित करने योग्य है, दुर्विनीतअपात्र को देने योग्य नहीं है, क्योंकि दुर्विनीत विद्या और विद्या दाता गुरु दोनों का पराभव करता है । विज्जं परिभवमाणो आयरियाणं गुणेऽपयासिंतो । रिसिघायगाणं लोयं वच्चइ मिच्छत्तसंजुत्तो ॥ ९॥ विद्या का पराभव करने वाला और आचार्य के गुणों को प्रकाशित न करनेवाला अप्रशंसक प्रबल मिथ्यात्व को प्राप्त दुर्विनीत जीव ऋषिघातक की गति अर्थात् नरकादि दुर्गति को पाता है । ४ पूर्वाचार्य रचित 'सिरिचंदावेज्झय पइण्णयं'
SR No.022597
Book TitleSirichandvejjhay Painnayam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurvacharya, Kalapurnasuri, Jayanandvijay
PublisherGuru Ramchandra Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages34
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_chandravedhyak
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy