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________________ १२९ ३६.९६१ -] उत्तराध्ययनसूत्रम् तिण्णेव सागरा ऊ उक्कोसेण वियाहिया। दोच्चाए जहनेणं एगं तु सागरोवमं ॥१६१॥ सत्तेव सागरा ऊ उक्कोसेण वियाहिया। तइयाए जहन्नेणं तिण्णेव सागरोवमा ॥१६॥ दस सागरोवमा ऊ उक्कोसेण वियाहिया। चउत्थीए जहन्नेणं सत्तेव सागरोवमा ॥१६३ ॥ सत्तरस सागरा ऊ उक्कोसेण वियाहिया। पंचमाए जहन्नेणं दस चेव सागरीवमा ॥१६॥ बावीस सागरा ऊ उक्कोसेण वियाहिया। छट्ठीए जहन्नेणं सत्तरस सागरोवमा ॥१६५॥ तेत्तीस सागरा ऊ उक्कोसेण वियाहिया। सत्तमाए जहनेणं बावीसं सागरोवमा ॥१६६ ॥ जा चेव य आउठिई नेरइयाणं वियाहिया। ' सा तेसिं कायठिई जहन्नुकोसिया भवे ॥१६७॥ अणन्तकालमुक्कोसं अन्तोमुहुन्तं जहन्नयं। विजढंमि सए काए नेरइयाणं अन्तरं ॥ १६८ ॥ एपसिं वण्णओ चेव गन्धओ रसफासओ। संठाणदेसओ वावि विहाणाई सहस्ससो॥ १६९ ॥ पंचिन्दियतिरिक्खाओ दुविहा ते वियाहिया। सम्मुच्छिमतिरिक्खाओ गम्भवक्कन्तिया तहा॥ १७ ॥. दुविहा ते भवे तिविहा जलयरा थलयरा तहा। खहयरा य बोद्धव्वा तेर्सि भेए सुणेह मे ॥ १७१॥ मच्छा य कच्छभा य गाहा य मगरा तहा। सुंसुमारा य बोद्धव्वा पंचहा जलयराहिया ॥ १७२॥ लोएगदेसे ते सव्वे न सम्वत्थ वियाहिया । एत्तो कालविभागं तु वोच्छं तेसिं चउन्विहं ॥ १७३ ॥ संतई पप्पऽणाईया अपज्जवसिया वि य । ठिई पडुच्च साईया सपज्जवसिया वि य ॥ १७४॥ एगा य पुत्वकोडी उ उक्कोसेण वियाहिया। आउट्टिई जलयराणं अन्तोमुहुत्तं जहनिया ॥ १७ ॥
SR No.022572
Book TitleUttaradhyayan Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorR D Wadekar, N V Vaidya
PublisherFergussion College
Publication Year1954
Total Pages132
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size10 MB
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