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________________ सनातनजैनग्रंथमालायांहिंदी-साधनसे ( हेतुसे ) साध्यके विशेषज्ञान होनेके अनुमान कहते हैं ॥ १४ ॥ - बंगला--साधन हइते [ हेतु हइते ] साध्येर विशेषज्ञान होओयाके अनुमान बले ॥ १४ ॥ साध्याविनाभावित्वेन निश्चितो हेतुः॥ १५ ॥ हिंदी-जो साध्यके साथ अविनाभावीपनेसे निश्चित हो अर्थात् साध्यके विना हो ही न सके, वह हेतु है ॥ १५॥ ___ बंगला--ये साध्येर संगे अविनाभावी रूपे निश्चित अर्थात् साध्यभिन्न हइते पारे ना ताहाके हेतु बले ॥ १५ ॥ सहक्रमभावनियमोऽविनाभावः ॥ १६॥ हिंदी-सहभाव नियम और क्रमभावनियमको अविनाभाव ( व्याप्ति ) कहते हैं ॥ १६ ॥ बंगला--सहभावनियम ओ क्रमभावनियमके अविनाभाव [व्याप्ति ] बले ॥१६॥ ___ सहचारिणोप्प्यव्यापकभावयोश्च सहभावः ॥१७ .. हिंदी-साथ रहनेवाले पदार्थों में, तथा आपसमें व्याप्यव्या पक पदार्थों में, सहभाव नामका अविनाभाव संबंध होता है । रूपरस साथ रहनेवाले हैं, और वृक्षत्व व्यापक और शिंशपात्व उसका व्याप्य है ॥ १७ ॥ बंगला--सहचारी पदार्थे एवं परस्पर व्याप्यव्यापक पदार्थे सहभाव नामक अविनभावसंबंध हय । रूप ओ रस सहचारी एवं वृक्षत्व व्यापक एवं शिंशपात्व ताहार व्याप्य ॥ १७ ॥ पूर्वोत्तरचारिणोः कार्यकारणयोश्च क्रमभावः॥१८॥ तर्कात्तनिर्णयः ॥ १९ ॥
SR No.022437
Book TitlePariksha Mukham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManikyanandisuri, Gajadharlal Jain, Surendrakumar
PublisherBharatiya Jain Siddhant Prakashini Samstha
Publication Year1916
Total Pages90
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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