________________
प.सा०
.८६॥
ओं “ अहेव य असया अटुसहस्सा य अट्ठकोडीओ।
माटी० रक्खंतु ते सरीरं देवासुरपणमिया सिद्धा ॥ ७॥ स्वाहा ।
अ०३ अनेन स्वस्यांगप्रत्यंगपरामर्शः कार्यः । ततः ओं धनु धनु महाधनु । स्वाहा । इमां धनुर्विद्यां । वामकरांगुलिपर्वसु विन्यस्थ प्रतिमाग्रे वामपादांगुष्ठेन सरेफागपुरस्सरं धनुरालिख्य वामपादेनाक्रम्य कायोत्सर्गेण स्थितः सन् ओं णमो अरहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं णमो उवज्झायाणं णमो लोए । सल्बसाहूणं थंभेइ नल जलण चिंतियमित्तेण पंचणमोकारो अरि मारि चोर राउल घोरुवसम्गं हां ही हूं ह्रौं हः विणासेइ स्वाहा । इदं सप्तवारान् हृद्युच्चार्य अष्टोत्तरशतं धनुर्विद्यामावर्तयेत् । इति सकलीकरण विधानं । अथ प्रतिष्ठा । कके दक्षिण पश्चिम और वांयें भागमें स्थापन करे ॥ यह सकलीकरण मंत्रकी क्रिया हुई ||| उसके बाद छठे सातवें दो श्लोकमंत्र पढकर अपने अंग उपांगोंको छुए ॥६॥७॥ उसके 3|| पीछे “ओंधनु" इत्यादि धनुषविद्याको वायें हाथकी उंगलियोंके पोरुओंमें स्थापनकर प्रतिमाके आगे वायें पैरके अंगूठेसे रेफ सहित वाणयुक्त धनुषको लिखकर वांये पैरसे आच्छादितकर खड़ासनसे "ओं णमो" इत्यादि स्वाहा पर्यंत मंत्रको सातवार मनमें बोलकर एकसौ आठवार धनुषमंत्रको जपै । इसतरह सकलीकरण क्रियाका कथन किया। अब प्रतिष्ठा करनेकी विधि कहते है;-सकलीकरणादि कर्म करनेके वाद प्रतिष्ठाचार्य वेदीके पूर्वसिंहासनके|||
000000