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________________ ३०० नवतत्त्वसंग्रहः अंतर घणा नास्त्यन्तरम् ज०६३ सहस्त्र ज०८४ सहस्त्र ज०१ समय, नास्ति जीव आश्री वर्ष, उ० १८ वर्ष, उ. १८ उ०६ मास अंतरम् कोटाकोटि कोटाकोटि सागरोपम सागरोपम ३१ समुद्धात | ६ केवल वर्जी धुरली ३ केवल १ ३२ क्षेत्र । लोकने असं- | → ए | असंख्यमे घणे, ख्यमे भाग असंख्य सर्वलोक ३३| स्पर्शना लोकने असं | असंख्यमे घणे, ख्यमे भाग असंख्य सर्वलोक ३४] भाव | क्षयोपशम व । म् । उपशम, क्षय ३५ परिमाण प्रतिपाद्यमान प्रतिपद्यमान पुलाकवत् । निर्ग्रन्थवत् प्रतिपद्यमान होवे, नही बी होवे, नही होवे, नही होवे, जे, बी होवे, जो बी होवे, जो होवे (तो) | होवे (तो) होवे (तो) ज० १।२।३, ज० १।२।३, ज० १।२।३, उ० पृथक् उ० पृथक् शत, उ० १६२, पूर्वप्रतिपन्न पूर्वप्रतिपन्न पूर्वप्रतिपन्न होवे, न बी पृथक् पृथक् सहस्र | होवे, (जो होवे कोटि कोड तो) ज० उ० | पृथक् शतकोटि अल्प | ५ संख्येय | ४ संख्येय २ संख्येय १ स्तोक ३ संख्येय बहुत्व गुणा गुणा ___ (११४) भगवती (श. ७, उ. २, सू. २७३) अल्पबहुत्व १ यंत्र । मूल गुण पच्चक्खाणी | उत्तरगुण पच्चक्खाणी अपच्चक्खाणी १ स्तोक २ असंख्येय ३ अनंत तिर्यंच पंचेन्द्रिय १ स्तोक २ असंख्येय ३ असंख्य मनुष्य १ स्तोक २ असंख्येय ३ असंख्य सहस्त्र, जीव
SR No.022331
Book TitleNavtattva Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijayanandsuri, Sanyamkirtivijay
PublisherSamyagyan Pracharak Samiti
Publication Year2013
Total Pages546
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size14 MB
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