SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 110
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १०५ णोवि किं लहसि ॥ १६ ॥ वरजत्त पाणन्हाणाय, सिंगार विलेवणेहिं पुगेवि ॥ निथ पहुणो विहमंतो, सुणदेण वि न सरिसोदेहो ॥ १७ ॥ कठा कमुत्र बहुया, जं धण मावजिथं तएजीव ॥ कलं तुऊ दाजं, तं अंते गहिअमन्नेहिं ॥१७॥ जहजह अन्नाण वसा, धणधन्न परिग्गरं बहुं कुण सि ॥ तहतह लहु निमऊसि, नवेनवे नारिथ तरिव ॥ १५ ॥ जा सुविणे विहु दिठी, हरे देहिण दिह सव्वस्सं ॥ सानारी मारी श्व, चयसु तुह मुबलत्तेणं ॥ २०॥ अहिलससि चि. त्तशुद्धि, रऊसि महिलासु अहह मुढत्तं ॥नीलीमिलीए कमि, धवलिमा किं चिरंगई ॥१॥ मोहेण नव दुरिए,बंधि खित्तोसिनेह निगमेहिं॥ बंधव मिसेण मुक्का, पहरीया तेसु कोराउ ॥२॥ धम्मोजणउ करूणा, माया नायाविवग नामेण ॥ खंति पिया सुपुन्ना, गुणो कुटंबश्मकुणसु ॥२३॥ अझ पालियाई पगर, जं नामीउसि बंधेज ॥ संतेवि पुरिसकारे, न लजसे जीव तेणंपी ॥४॥
SR No.022320
Book TitlePrakaran Ratnakar Mool
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMehta Nagardas Pragjibhai
PublisherMehta Nagardas Pragjibhai
Publication Year1936
Total Pages118
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy