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________________ श्री संवेगरंगशाला ६०५ योग्यता आदि से लेकर फल प्राप्ति तक द्वार कहा है। अब जीव रहित क्षपक मुनि के मतक शरीर के विषय में जो कुछ कर्त्तव्य के विस्तार करणीय है उसे श्री जैनागम कथनानुसार न्याय से साधुओं के अनुग्रह के लिए विजहना नामक द्वार से कहा जाता है। यहाँ विजहना, परिठ्ठवणा, परित्याग, फैंक देना आदि शब्द एक समान अर्थ वाले हैं। नौवाँ विजहना द्वार :-पूर्व कहे अनुसार आराधना करते क्षपक मुनि जब मर जाये तब तक निर्यामक साधुओं को उसके शरीर विषय में यह विजहना सम्यक् करना। अहो ! तूने महाभाग क्षपक को इस तरह चिरकाल औषधादि उपचारों से सार संभाल ली, चिरकाल तक सेवा की, चिरकाल सहवास में रहा, साथ रहा, चिरकाल पढ़ाया, और बहुत समय तक समाधि द्वारा अनुग्रहित किया, ज्ञानादि गुणों द्वारा तू हमको भाई समान, पुत्र समान, मित्र समान, प्रिय और शुद्ध प्रेम का परम पात्र था परन्तु तुझे निर्दय मृत्यु ने आज क्यों छीन लिया ? हा ! हा ! हम लूटे गए। हम लूटे गये हैं। इस तरह रोने के शब्द बोलना आदि शोक नहीं करना, क्योंकि ऐसा करने से शीघ्र शरीर क्षीण होता है, सारा बल क्षीण होता है, स्मृति नाश होती है, बुद्धि विपरीत होती है, पागलपन प्रगट होता है और हृदय रोग भी हो सकता है। इन्द्रियों की शक्ति कम होती है, किसी तरह क्षुद्र देवी ठगती है और शास्त्र श्रवण से प्रगट हुआ शुभ विवेक का भी नाश होता है, लघुता होती है और लोग में अत्यन्त विमूढ़त्व माना जाता है। अधिक क्या कहें ? शोक सर्व अनर्थों का समूह है । इसलिए उसे दूर छोड़कर निर्यामक महामुनि अति अप्रमत्त चित्त से इस तरह संसार स्थिति का विचार करे कि-हे जीव ! तू शोक क्यों करता है ? क्या तू नहीं जानता कि जो यहाँ जन्म लेता है उसका मरण है, पुनः जन्म और पुनः मरण अवश्यभावी हैं ? यह मरण रुकता नहीं है, अन्यथा दुष्ट भस्म राशि ग्रह के उदय होने पर भी और इन्द्र की विनती होने पर भी अतुल बल-वीर्य वाले, तीन जगत के परमेश्वर श्री वीर परमात्मा ने सिद्धि गमन के समय थोड़ी भी राह भी नहीं देखी। और दीर्घ काल तक सुकृत्य का संचय करने वाले गुण श्रेणी के आधारभूत अतिचार रूप कीचड़ से रहित निरतिचार संयम के उद्यम में प्रयत्नशील और आराधना की साधना कर काल धर्म को प्राप्त करने वाले उस क्षपक मुनि को शोक करना अल्पमात्र भी योग्य नहीं है। इस विषय में अधिक क्या कहें ? इस प्रकार सम्यक विचार कर धीर वह निर्यामक उद्वेग रहित शीघ्र उसे करने योग्य समग्र विधि करे। केवल काल हुए का मृत शरीर वसति के अन्दर अथवा बाहर भी हो, यदि अन्दर हो तो निर्यामक इस विधि से उसे परठना त्याग करे।
SR No.022301
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmvijay
PublisherNIrgranth Sahitya Prakashan Sangh
Publication Year1986
Total Pages648
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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