SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 101
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ॥ अथावरार्थः धन्ने तिहारपरामर्श :-तरहधन्ने ति नरतत्रधान्येषु मध्ये केनापि देवेन दानवेन वा कुतूहविना-सिद्धार्थानां सर्षपाणां प्रस्यस्य सेतिकाचतुष्टयात्मकस्य क्षेपः कृतः, तत : स्थविरयात्यंतवृष्या स्त्रिया कर्तृनूतया-अवगिचण त्ति अववेचनेना शेषधान्येज्य : पृथक्करणेन यन् मीननं प्रस्तुतसर्षपक्षानो मनुष्य प्राप्तिरिति. (७) ___ हवे गायानो अकार्य कर ले. धान्य ए पदयी धार याद कर्यो. जरतधान्य एटने के जरतक्षेत्रना धान्यामा कोइ कुतूहबी देव के दानवे सरसपनो प्रस्थ एटने चार सेतिकामो नाखी. वाद स्थविरा एटने अत्यंत वृध स्त्री तेनु अवगिंचन को एटनेके तमाम धान्यो- 8 थी तेने छूटुं करे, तम करीने ते सरसवनी पात्री मेळवे ( ए जेम सुइकेन बे) तेम मनुष्याणानी प्राप्ति थवी पुर्वन छे. अथ चतुर्थदृष्टांतसंग्रहगाथा. जूयंमि थेरनिवसुयरजसहसययंसि दाएणं, एत्तो जयान अहिओ-मुहाइ नेत्रो मणुयत्रानो. ॥ ए॥ हवे चोय दृष्टांतनी संग्रहगाथा कहे जे :घृत पदयी धार याद कयों के. वृछ राजानो पुत्र-राज्य मेळववा-दरेक असीपर एकसो आउवार दान रमीने–सना जीते, ए जय करतां पण या गमावे@ मनुष्य जन्म मळवू अधिक मुश्केत छे. श्री उपदेशपद.
SR No.022167
Book TitleUpdeshpad Part 01
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
Author
PublisherLalan Niketan Madhada
Publication Year1925
Total Pages420
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy