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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org ३६८ ] श्री विपाक सूत्र - [ षष्ठ अध्याय हैं। अतः दुर्योधन के जीव का नन्दिषेण के रूप में अवतरित होना कोई आश्चर्यजनक नहीं है । " एयारूवे जाव समुप्पज्जित्था " यहां का जाव - यावत् पद " - श्रज्मत्थिते कपिए चिन्तिर पत्थिए मणोगए संकप्पे -" इन पदों का परिचायक है। इन का अर्थ पृष्ठ १३३ पर किया जा चुका है । तथा-भीए ४ - यहां पर दिये गये ४ के अंक से - तत्थे उग्विग्गे संजातभए - " इन पदों का ग्रहण करना चाहिये । इन का अर्थ पदार्थ में दिया जा चुका है । " Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir +6 - करयल० जाव एवं - " यहां के बिन्दु तथा जाब - यावत् पद से संसूचित पाठ को पृष्ठ २४६ पर लिखा जा चुका है। तथा " - रज्जे जाव मुच्छिते ४ – यहां पठित जाब - यावत् पद से " - रट्ठे य कोले य कोट्टागारे य बले य वाहणे य पुरे य अन्तेउरे य-" इन पदों का ग्रहण करमा सूत्रकार को इष्ट है। राज्य शब्द बादशाहत का बोधक है । किसी महान् देश का नाम राष्ट्र है । कोष खजाने को कहते हैं । धान्यगृह अथवा भाण्डागार का नाम कोष्ठागार है । बल सेना को कहते हैं । वाहन शब्द रथ आदि यान और जहाज़, नौका आदि के लिये प्रयुक्त होता है । पुर नगर का नाम है। अन्तःपुर रणवास को कहते हैं । तथा - मुच्छिते ४ - यहां दिये गये • के अंक से " - गिद्धे. गढ़िए, श्रज्भोववन्ने – ” इन पदों का ग्रहण करना सूत्रकार को अभिमत है । इनका अर्थ पृष्ठ १७३ पर दिया गया है । "C " - श्रातुरुत्ते जाव साहहु – " faster faafai भिउडिं निडाले सुरु - इत्यादि पदों का अर्थ पृष्ठ “– एएणं विहाणेणं " यहां पठित जाव - यावत् पद से - रुट्ठे, कुविए, च" इन पदों का ग्रहण करना सूत्रकार को अभिमत है । - १७७ पर कर दिया गया है । यहां प्रयुक्त एतद् शब्द उस विधान - प्रकार का परिचायक है, जिसे भिक्षा को गये भगवान् गौतम स्वामी ने मथुरा नगरी के राजमार्ग पर देखा था । तथा एतद्शब्द - सम्बन्धी विस्तृत विवेचन पृष्ठ १७८ पर किया गया है । है कि वहां उज्झितक कुमार का वर्णन है, जब कि " - पुते जाव विहति - " यहां पठित पाठक वहां देख सकते हैं । अन्तर मात्र इतना प्रस्तुत में नन्दिषे का। जाव - यावत् पद पृष्ठ ४७ पर पढ़े गये सुभाणं - " इत्यादि पदों का परिचायक है । 66 - पुरा पोराणाणं दुच्चिराणा, दुप्पक्किन्ताणं गत सूत्रों में भगवान् गौतम के प्रश्न के उत्तर का वर्णन किया गया है । अत्र सूत्रकार अनगार गौतम की अग्रिम जिज्ञासा का वर्णन करते हैं - १ मूल - ' दिसेणे कुमारे इत्र चुते कालम से कालं किच्चा कहिं गच्छहिति ? कहिं उववज्जिह्निति १ पदार्थ - णं दिसेणे – नन्दिषेण । कुमारे-कुमार । इओ यहां से । चुते व्यव कर मर कर । कालमासे - कालमास में । कालं किच्चा - काल करके । कहि- कहां । गच्छिहिति १ - जायेगा ?, और कहिं - कहां पर । उववज्जिहिति १ – उत्पन्न होगा ? | कुत्रोपपत्स्यते ? मूलार्थ गौतम स्वामी ने भगवान् से फिर पूछा कि भगवन् १ नन्दिषेण कुमार यहां से मृत्युसमय में काल करके कहां जायगा ? और कहां पर उत्पन्न होगा ? - ( १ ) - छाया - नन्दिषेणः कुमारः इतश्च्युतः कालमासे कालं कृत्वा कुत्र गमिष्यति १ For Private And Personal
SR No.020898
Book TitleVipak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanmuni, Hemchandra Maharaj
PublisherJain Shastramala Karyalay
Publication Year1954
Total Pages829
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_vipakshrut
File Size20 MB
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