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(५८) जव जव मुजने मितज्यो रे ॥सा॥ शुहं कर रे ॥मागाजी॥ एहीज सुणी अरदास वांरित पूरणकर ज्योरे रे ॥सा॥हा॥ कृपा करी रे ।। झा ॥७॥ इति पदम् २ देशी धूमररी ॥२॥
आदि जिनंद नित पूजीय एतो विमलाचल गिरिरायो हे माय ॥ नाजिराय कुल चंदलो, एतो मरुदेवी कूखै जायो है माय ॥ आ॥१॥ नगरी बीनीता नो धणी, एतो आदीश्वर सुखकारी हे माय ॥ अष्टापदै मुगते गया, एतो नविजन काज सुधारीहे माय ॥ भात ॥॥ प्रजु दरिसण जलधार सै, एतो जविसारंग उलसावै ए माय ॥ दरसणविन किरिया सदु, एतो सिव साधन नवि श्रावे हे माय ॥ श्रा० ॥३॥ सजी सिणगार मनोहरू, एतो गौरिमंगल गावे है ॥श्रा०॥ अव्य नाव जिनराजनी, एतो पूजा करी सुख पावै है माय॥ श्राधा वसुदिन उन्नव रंगसुं, एतो दिन दिन संघ सवायो है माय|पंचम अंग पूरण करी, एतो कृपाचंद गुणगायो है ॥माय ॥ ॥॥इति पदमाश
॥क दिन पुंमरीक गणधरं रै लाल ॥
- ॥ए-देशी॥ . ॥ वीर जिनेसर सांजलोरे ॥ लालम् सेवकनी अरदास सुखकारी रे ॥ तारकविरुदसुहामणो रे खाल सुणी आयो तुम पास उपकारी रे० वीर ॥१॥ साहिब सुनिजर कीजियेरे ॥ ला० ॥ मुजपर गरीब निवाज ॥ ॥ मन मोहन महिमा निलोरे ॥सा ॥ तुमसेवा सुखकाज ॥ उ० ॥वी ॥२॥ काल अनादि बगै जम्योरे ॥ ला ॥ जव अटवी विषम अगाध ॥ सु०॥ क्रोधादिक स्वापद जिहांरे ॥ लाम् ॥ प्रति
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