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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir -[२८]इसी प्रकार हरिवंशपुराणमें श्रीनेमिनाथ तीर्थकरके जन्मोत्सबके वर्णनमें भी निम्नलिखित प्रमाण है । ततः सुरपतिस्त्रियः जिनमुपेत्य शच्यादयः। सुगंधितनुपूर्वकैः मृदुकराः समुद्रर्तनम् । प्रचारभिषचन शुभपयांभिरुचघटैः। पयोधरभर्निजरिव कुचैः समावर्तितः। अर्थात् उसके बाद शची महादेवी आदि देवांगनावोने भगवंतके शरीरको स्पर्श करते हुए सुगंधित जल्स अभिषेक किया । वे घट उनके कुचकुंभवे. अनुसार थे। सभी इंद्राणियोंने एक साथ ही अभिषेक किया। श्री भगवद् गुणभद्राचार्य कृत जिनदत्त चरित्रमें देखिये । गृतिगंधपुष्पादिप्रार्चनाःसपरिच्छदा। अथैकदा जगामैषा प्रातरंव जिनालयम् । त्रिःपरीत्य ततः स्तुत्वा जिनांश्च चतुराशया, संस्नाप्य पून यित्वा च प्रयाता यतिसंसदि । अर्थात्:-एक दन वह श्रष्ठिपत्नी जीव-सा स्नानादिके द्वारा शुद्ध होकर अपने परिवार के साथ प्रातः जिनालयमें गई, और जिनालयको तीन प्रदक्षिणा देकर स्तुतिपूर्वक अभिषेक करके मुनियोंकी सभामें गई। श्र नेमिचंद्रकृत श्रीपालचरित्रमें देखिये:अथैकदा नुता सा च सुधी मदनसुंदरी। कृत्ला पंचामृतः स्नान जिनानां सुखकोटिंद। अर्थात् अनंतर वह गुणवती मदनसुंदरीने कोटिसुखप्रद, जिनेंद्रका पंचामृतोंसे अभिषेक किया । आराधना कथाकाषमें प्रमाण देखिए । For Private and Personal Use Only
SR No.020534
Book TitlePanchamrutabhishek Path
Original Sutra AuthorN/A
AuthorZaveri Chandmal Jodhkaran Gadiya
PublisherZaveri Chandmal Jodhkaran Gadiya
Publication Year1958
Total Pages42
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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